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शनिवार, अप्रैल 9

लोकपाल की जीत के बाद, अब RTR की जंग...!!


जन-लोकपाल बिल पर जीत हासिल करने के बाद अन्ना हज़ारे RTR यानी राइट टू रिकॉल के लिये आंदोलन करेगें। अन्ना हज़ारे यह घोषणा 100 घंटो तक चले अमरण अनशन के बात आई हैं। आखिर इस बार सरकार और संसार ने भी देख लिया कि फेसबुकिंग करने वाले युवा जंतर-मंतर पर फेस-टू-फेस भी हो सकते है। ट्विट करने वाले अभिनेता, अन्ना के मंच पर जनादेश का मंचन भी कर सकते हैं, सनसनी और भूत बेचने वाले खबरियां चैनल हज़ारे का हथोड़ा बनकर सरकार की चूल्हे तक हिला सकते हैं।


अन्ना हज़ारे वहीं गाँधीवादी हैं, जिन्होनें 2003 में 12 दिन की भूख हड़ताल करके RTI यानी सूचना के अधिकार को लागू करवाया था और आज 42 सालों से ठंडे बस्ते में पड़े लोकपाल बिल पर मनमोहन सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर डाला। अब इस गाँधीवादी महानायक ने आरटीआर यानी वापस बुलाने के अधिकार का आवाहन किया हैं। इस अधिकार का उदाहरण पहले पहल ग्रीस के नगर राज्यों में मिलता था। जहां एथेंस और स्पाटा के नगरिक अपने चुने हुऐ नेताओं के विरोध में चुनाव ने पहले वोट देकर उन्हे सत्ता छोड़ने पर कानूनी रुप से बाध्य कर सकते थे।

वर्तमान में इसका चलन कुछ हद तक अमेरिका के छोटे राज्यों में है लेकिन आमतौर पर इसे बड़े मुल्कों और लोकतंत्र में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि यह कानून प्राचीन यूनानी नगर-राज्यों में तो चल सकता था लेकिन आज के राष्ट्रीय राज्यों और खासतौर पर भारत जैसे मुल्कों में इसकी कोई जगह नहीं, जहां की आबादी 120 करोड़ से भी ज्यादा हैं। हांलाकि आज भी भारत की पंचायतों में पंच को ग्रामसभा बहुमत के कार्यकाल खत्म होने से पहले भी रुक्सत कर सकती है और संसद में हर 6 महीने के बाद, 50 सासंदो के ज्ञापन से सरकार को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा सकता है, लेकिन मुख्य रुप से वापस बुलाने के अधिकार से इस देश के नागरिक अज्ञान और वंचित हैं।

अन्ना हज़ारे की कोशिश है कि अव्वल तो सूचना के अधिकार से भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के खिलाफ सबूत जुटायें जाए, उसके बाद लोकपाल कानून से उन्हे सज़ा दिलाई जाऐ और फिर भी उनका सत्ता का नशा नहीं टूटे तो आरटीआर से उन्हे वापस बुलाने का अधिकार भी जनता के पास होना चाहिये। हालांकि इसके लिये अभी दूर तक चलना होगा पर जंतर मंतर से अन्ना से जता दिया कि वो जनता के लिये कितनी ही दूर तक चलने की ताकत रखते हैं।


सरकार का कहना है कि वैसे भी चुनाव में जो खर्च आता है उसे झेलना भारत जैसे विकासशील मुल्क के लिए बड़ी बात है और अगर आरटीआर को कानूनी दर्जा दिया गया तो देश का दिवालिया निकल जाएगा। चुनावी खर्च देश को कंगाल कर देगा और विकास का रास्त रुक जाएगा। इस तर्क को काटने के लिये दो तीर है पहला तकनीक और दूसरा जनादेश ..। आज दिल्ली की आबादी से ज्यादा इस शहर में सेल फोन है, हर दूसरा नागरिक ई-मेल करना जानता है। देश-भर में 70 करोड़ लोग मोबाईल धारक हैं और 70 फीसदी पढ़े-लिखे भी..। तो क्या मेल या एसएमएस से वोटिंग मुमकिन नहीं ? क्यों लोकतंत्र का अर्थ बस एक बार वोट देकर पांच साल की सत्ता सौंपना भर है ? क्या यूनानी नगर-राज्यों और भारतीय पंचायतीराज के मूल्यों से गांधी के स्वराज को पाया नहीं जा सकता ?


अगर फिर भी सरकार का जवाब नेगटिव रहता है तो याद रहे लीबिया, मिस्र और यमन में चुनाव नहीं हुऐ है पर सरकारें बदल गई हैं, सत्ता छिन गई है और तख़्त पलट दिए गये है। कोई पांच साल का इंतज़ार नहीं और किसी पार्टी का घोषणा-पत्र नहीं..आवाम उठी और तक़त उलट गये। आज 10 जनपंथ और 7 आरसीआर से भी अन्ना के अनशन की शक्ति देख ली है और अगर 100 घंटो का यह आंदोलन नहीं थमता तो जंतर-मंतर, तहरीक चौक बन सकता था और 100 कदमों की दूरी पर था संसद..। बच्चे के रोये बिना को उसकी मां दूध तक नहीं पिलाती तो अधिकार से लिये लड़ाई तो करनी ही होगी..नक्सलियों की तरह जंगलो में छुपकर नहीं..देश की राजधानी में उसकी सरकार के सामने क्योकि यह गंदातंत्र नही हमारी लोकशाही है और अभी लड़ाई जारी हैं..!!

शुक्रवार, अप्रैल 8

अन्ना का अनशन, आंदोलन और हम लोग


जब भी कभी किसी पांच सितारा होटल के गलियारे में, एसी चैम्बर में बैठे अभिजात यानी ऐलीट लोगों की भ्रष्टाचार की बात होती है तो एक वाक़या हमेशा सुनाया जाता है। एक इंडियन सांसद अमेरिका गया, वहां की उच्च सदन सीनेट के सांसद से मिलने...अमेरिकी सांसद का घर बहुत अच्छा था..महल जैसा..रंगीन पर्दों के पीछे से उन्होनें भारतीय सांसद को पास का पुल दिखाया और बोले " आपको ये पुल नज़र आ रहा है..50 पर्सेंट"..यानी पुल के लिये कुल बजट का 50 फीसदी पुल के निर्माण में लगा और आधा उस अमेरिकी सांसद के घर को महल बनाने में..। कुछ महीनों के बाद वो अमेरिकी सांसद दिल्ली पहुचे, अपने इंडियन सांसद दोस्त के घर गये..फिर हमारे भारतीय सांसद ने उन्हें अपने सरकारी आवास से रोड पर लगा ट्रैफिक-जाम दिखाया और बोले " आपको वो फ्लाई ओवर दिख रहा है ?" जवाब मिला नहीं..क्योंकि वहां ट्रैफिक जाम तो था पर कोई फ्लाई ओवर नहीं..। हमारे सांसद साहब बोले.."100 पर्सेंट" और उनके हाथ में स्विसबैंक अकाउंट का आईडी था। यानी भारत में भ्रष्टाचार नहीं होता..100 फीसदी लूट होती है..फ्लाईलों में फंसाना बनता है और अफ़ग़ानों में काले धन की ख़बरे...।


आज इस लूट को रोकने के लिये अन्ना अनशन पर है... ख़बरियां चैनल कहते हैं कि यह अनशन नहीं आंदोलन है। फेसबुक पर मुहिम चलती है कि इस दफा का भारत रत्न सचिन को मिले या अन्ना को, ट्यूटर पर पोस्ट आता है कि अन्ना के आगे आईपीएल फेल हो गया, जीमेल-बज़ पर बुद्धिजीवी लोग अन्ना के अनशन स्थल को यानी जंतर-मंतर को भारत के तारीख़ चौक की संज्ञा देते है, एसएमएस और मेल आता है कि जब मनमोहन बिना चुनाव लड़े पीएम बन सकते है तो अन्ना बिना संसद पहुचे जन-लोकपाल बिल पास क्यो नहीं करवा सकते..। जंतर मंतर हज़ारों की भीड़ तो है, पर भीड़ से भीड़तंत्र बनता है लोकशाही नहीं..। कुछ जवा लोग इंडिया गेट की जगह जंतर-मतंर में तफ़री करते नज़र आते है..कुछ न्यूज़ चैनलों में दिखने की हज़रत लिये, कुछ पेरेंटस् अपने बच्चों की पीकनिक के बहाने यह दिखाने पहुंचते है कि एक सदी पहले गांधी की आंधी कुछ ऐसे ही चलती होगी..। क्या इससे 100फीसदी की लूट रुक पाएगी ?

अगर यहीं सच्ची तस्वीर है तो तथाकथित आज़ादी की दूसरी जंग की हालत भी पहले जैसी ही रहेगी..। 1947 की कीमत हमे आज याद नहीं क्योंकि आज़ादी के पेड़ के फल खाने के लिये..बहुत से राजा, कलमाडी, नीरा, हसन और रानी तक तैयार हैं। 1965 के नक्सवाड़ी के नेता चारु मजरुमदार , कानू सांयाल की सर्वहारा सोच की खेती कृष्णजी और गणपती जैसे नक्सली नेता आदिवासियों और पुलिस का खून मिलाकर खा रहे है। 1977 के लोकतंत्र की लड़ाई के सिपाई जेपी और लौहिया के लोग मुलायम, लालू, नीतिश, जॉर्ज ने सत्ता और चारा दोनो की मालाई खाई हैं..। 1992 और 2006 के आरक्षण और मंडल-मंडल की लड़ाई लड़ने वाले आज खुद रेल पर रेला निकालकर आरक्षण की भीख चाहते हैं। तो क्या अन्ना के अनशन और आन्दोलन की भीड़ से भ्रष्टाचार का भूत क्या भाग पाएगा ? और केजरीवाल, अग्नीवेश,रामदेव, किरनबेदी भविष्य के लालू-शरद और मुलायम यादव नहीं बनेगें ?

अभी दस साल भी नहीं बीते कि जब अन्ना हज़ारे ने 12 दिन सत्याग्रह करके सूचना का अधिकार पाया था। आज आरटीआई हथियार कम और दुकान ज्यादा बन गया हैं । इस बात कि क्या गारंटी है कि अगर मनमोहन सरकार लोकपाल बिल की मसौदा कमेटी में अन्ना का अध्यक्ष बना देगें, अगर नोटिफिकेश भी आ जाएगा तो भी इस बिल की हालत तलेंगाना राज्य की जैसी नहीं होगी, जिसके लिये आमरण अनशन के डर से एक कमेटी बनी, फिर उस कमेटी पर विचार करने के लिये एक ओर कमेटी लेकिन नतीज़ा सफ़र यानी शून्य, सियासी गोला और हीरो का ज़ीरो...।


हांलाकि हज़ारे के पास दो ऐसी बाते हो जो इस ज़ीरो के आगे लगकर सियासी रहनुओं के 19 पर 20 साबित हो सकती हैं। पहली भय और भूख और भ्रष्टाचार के नारो से उलट इस लूट को रोकने के लिये रोड़-मेप यानी जन-लोकपाल बिल का मसौदा है। और दूसरे हम लोग..। क्योंकि अन्ना का अनशन सीलिगं या एक रेंक-एक पेंशन के सामुहिक हितों के लिये नहीं है, उसका अनशन जेसिका लाल या प्रियदर्शीनी मट्टू जैसे वक्तिगत न्याय के लिये भी नहीं है। उसका अनशन हमारे लिये हैं। ताकि हमे सरकारी अस्पतालों में कफन तक के लिये रिश्वत नही देनी पड़े, ताकि काला-धन के कुबेर तिहाड़ जेल में नज़र आये, थानो में केस दर्ज हो, स्कूलों में मिले दाख़िला और भारत को सोने की चड़ियां वापस मिले..।


जंतर मंतर पर भीड़ है या जागरुक जनता इस पर सवाल उठाये जा सकते है लेकिन वो पैसे देकर भाड़े पर जुटाई नहीं गई, यह भीड़ भी सरकार के लिये वोट बैंक है..यह जताने के लिये काफी है कि हम नेता की रियाआ नहीं जो जाति और दारु के नाम पर बिकती रहे..हम भारत के लोग जनता है, प्रजा नहीं। चड़ियां के घोसले से फ्लेटो में रहकर, बुद्धू डिब्बे के कम्पियुटर कर काम करके और गूगल के चश्मे से संसार को देखकर भी..आज़ाद आवाम है। 10 जनपथ पर बैचेनी है, 7 आरसीआर में खलबली है, और मुम्बई के फिल्म वाले जहन में रंग दे बंससी या युवा जैसी एक और मूवी बनाने की मंशा..। 2जी में फसे मीडिया के गिग्ज दलाल भी जंतर-मंतर से लाइव करने पर मजबूर है, इस बिल से भीगी बिल्ली बनी बीजेपी भी समर्थन कर रही हैं और राजमाता सोनिया जी अन्ना के अपील..।


बड़ी बात यह नहीं है कि अन्ना का अनशन कामयाब होगा या नहीं, बड़ी बात यह भी नहीं की जंतर-मंतर की भीड़ जनमत का आंदोलन खड़ा कर पाएगी या नहीं..। बड़ी बात उस सांसद वाले वाक्य को फिर से पढ़ने की है..। कि उन सियासी लूटेरो के पास स्विजबैक अकाउंट है, गाड़ी और बगंला, जैवर और जांगीर भी..तो जनादेश का डर भी इन्हे ही लगना चाहिये..। अगर जनमत की आग फैलेगी को उस 80 करोड़ नागरिकों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा जो दिन भर मेहनत से 20 रुपये ही कमाने पर इन लालफीताशाही नवाबों के महल जलकल ख़ाक ज़रूर हो जाएगें..। डर गरीबी की ज़ज़ीरो में फसे आवाम के नहीं, हमारे हुकमराने के दिन में है..लूट के बंद हो जाने के डर का नाम ही है जन-लोकपाल बिल..। इसलिये ज़रूरी है कि इस बार नवरात्रो का व्रत मिट्टी की मूर्ति के वास्त नहीं माटी के मानव के वास्ते जंतर-मंतर पर जाकर रखा जाए क्योंकि आज ये देश दवि या भगवान हवाले नहीं, हज़ारे और उनका साथ देने वाले हजारों लोगो के हवाले है..आखिर नेताओं के इस डर के आगे लोकपाल बिल है..।

शुक्रवार, दिसंबर 3

बलात्कार - सेक्स और समाज का चश्मा

आज सुबह की बात हैं मेट्रो से दफ्तर का सफर तभी किसी दोस्त का फोन आया बोली मैं बहुत खुश हूं आज के दिन पर.. मैनें सोचा आज तो भोपाल गैस कांड की बरसी है तो आज के दिन खुश होने वाली भला क्या बात? फिर वो बोली अख़बार पढ़कर खुश हुई, उसमें धौलाकुआं रेप के केस के दो आरोपियों की गिरफ्तारी की ख़बर छपी थी। वो बोली “चलो कम से कम पुलिस के हत्थे तो चढ़े..लेकिन अगर रेप होता ही नहीं सुरक्षा इतनी पुख्ता होती तो अच्छा रहता।“ मैनें कहा “ बेहतर होता कि बलात्कार पीड़ित लड़कियों को समाज स्वीकार ले ” उसने कहा कि exceptions से रेप होने बंद हो जाएंगे, मेरा जवाब था नहीं लेकिन परिवर्तन जरुर आएगा। हरियाणा में सबसे ज्यादा भ्रूण हत्या क्यों होती हैं ? क्योंकि वहीं रोटी-बेटी का रिश्ता सबसे व्यापक है, दहेज बहुत चलता हैं। जब बेटी होना महंगा और घाटे का सौदा है तो भला कौन मोल ले इस मुसीबत को !! जवाब सीधा सा है अगर दहेज रुकेगा तो लड़ियां भड़ेगी..फिर चाहे उसके बदले हुड्डा अपने चुनावी मैनेफ्सटो में लिखवाये कि हरियाणा में किसी को कुंवारा नहीं रहने देंगे या शीला लाडली सी योनजा चलाए कुछ नहीं बदलने वाला...।

वो बोली दहेज से रेप का क्या रिश्ता, मैनें जवाब दिया कि देख रेप एक Sexual-Physical मुद्दा है और दहेज-भ्रूण हत्या एक Socio-economical ममला पर दोनों में स्त्री समान है और सामान भी...। दहेज़ रोकने के बेटियों की बलि रुकेगी और रेप पीड़ित लड़कियों को दिल और समाज (शादी) अपनाने से दर्द कम होगा। ठीक वैसे ही जैसे जब हमें बुखार होता है, तो हम चाहते हैं कि घरवाले हमारी केयर करें और अगर किसी लड़की का रेप हो तो उसे भी लाइफ में उस वक्त सबसे ज्यादा जरुरत अपने पति-पिता या प्यार की ही होगी..क्योकि इसमें उसका कोई कसूर नहीं था, जो उसे मौत सा दर्द सहना पड़ा कम से कम पुरुष उसके दर्द पर दवा का काम तो कर सकते है नमक की जगह...।

मेरी दोस्त बोली कि ऐसा तो exceptional नहीं मुनिंग है, मेरा जवाब था – “आज हम दोनों लव-मैरिज़ करने जा रहे हैं, 100 साल पहले ये मुनिंग नहीं था। उससे 100 साल पहले विधवा-विवाह सम्भव नहीं था, लेकिन राममोहन राय ने करके दिखाया। और आज लड़के के मर जाने पर उसके मां-बाप ही अपनी बहु की शादी की वकालत आमतौर पर रहते हैं। दोस्त ये कोई रुसी क्रातिं नहीं है, जो पल भर में हो जाये और क्षण भर में बर्लिन की दीवार की तर्ज पर ढह जायें..परिवर्तन एक दिन में नहीं होता लेकिन सदा के लिये होता हैं।“ मेने एक नॉवल पढ़ा। कारगिल के किसी अफसर का, जिसमें 99 की जंग में देश के लिये वो अपाहिज हो गया था। अपनी पत्नी को सेक्सव्ल खुशी नहीं दे सकता था। उसने अपनी पत्नी के लिये जिगोलो (मेल-कॉल बॉय) बुलाना शुरु किया आज वो दोनो (पति-पत्नी) साथ है और खुश भी...ये प्यार है और परिवर्तन भी..। जो रेप के बाद अपनाने से किसी भी तरह कमतर नहीं ।

यहां सवाल सिर्फ धौलाकुआं रेप केस तक सीमित नहीं है। हर रेप के बाद ऐसे लोगो की कमी नहीं होती जो कभी वक्त और कभी वस्त्रो को बहाना बनाकर लड़की के क्रकट्रर पर सवाल खड़े करते रहते हैं। लेकिन रेप भी दो किस्म के होते है गैरकानूनी रेप और कानूनी या सामाजिक रेप। मेरी एक बंगाली दोस्त थी आर्कुट-फ्रेंट उसने बताया था कि, बच्चपन में उसके मामा उसके साथ रेप करते थे। लेकिन वो कुछ बोल नहीं पाती..आज भी उसे हर लड़के से डर लगता हैं, मानो वो यमदूत हो..। मेरे बहुत समझाने पर वो एक लड़के से शादी के लिये राज़ी हो गई..लेकिन शादी के बाद वो कभी खुल कर जी पाई होगी या नहीं मै नहीं जानता...। यह फैमेनिस्टा के लिये मुद्दा हो सकता है लेकिन समाज के लिये सवालह हैं कि मामा से लेकर पति के भाईयों तक इसे कहते हैं Social rape। मेरी कुछ दोस्त ऐसी भी है जिनके साथ Legal Rape होता है..यानी जब periods या pregnancy में उनका पति बिना रज़ामंदी के सैक्स करता हैं। और वो चिल्लाकर, रोकर, मरकर सो जाती हैं, अगर दिन का दर्द सहने के लिये..।

एक लड़की थी, किसी जमानें में मेरे सबसे करीब, उसकी जाति या मज़हब बनाना नहीं जरुरी वरना पाढक उसमें भी वज़ह डूंडनें लगेगें। उसका बच्चपन छोटे परिवार में गुज़रा था, जवानी की दहलीज पर किसी कारण जौवांइट फैमली में जाना पड़ा। वो बताती थी कि उसके संयुक्त परिवार में जब लड़कियां 14-15 साल ही होती है, उनके कज़न (चचेरे-भाई) कई बार उन्हें पीछे से आकर पकड़ लेते थे। अगर विरोध किया तो बोलते “ बहन डर गई, बहन डर गई” और अगर नहीं किया तो बहुन......द बन गये..। ये किसी भी लड़के या लड़की की वो उमर होती है, जब सेक्स की फीलिगं अपने शबाब पर होती हैं जब परिवार चोखट से बाहर ना जाने दें भाई-दूज से कुछ और भी बन जाता हैं। जब मेनें पहले-पहल ये बात उसके मुह से सुनी तो आखों से आसु निकल पड़े...। मेरे उसे कहा कि कभी तुमनें ऐसी बात मम्मी को नहीं बताई..वो बाली एक बार उसके अपने भाई और एक कज़न को सेक्स करते देख लिया था। दोनो गै वाले काम कर रहे थे..रोती-रोती मम्मी के पास गई, सारी बात बताई..मम्मी बोली अनदेखा करे दो...।“ ये कहकर उसकी आखें छलक गई..मेनें उसे लगें से लगाया, क्योकि उस वक्त उससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं करता था..पढ़ रहा था, नौकरी नहीं थी..अगर होती तो यकीन्न उसी समय उससे शादी कर लेता और उस घर लौटनें नहीं देता। यह था Social Rape, जब IPC377 हुआ करती थी। गै होना कानूनी अपराध था लेकिन परिवार पापी हो जायें तो पार्थना भला किसेसे कीजिऐंगा..। जो एक परिवारिक इज्जत का दरीचा बनाकर, उस गलीचे के नीचें औरत का सम्मान की समाधी लगा देते हैं..।

लड़कियों की आप बीती हो बहुत पढ़ ली अब एक लड़के का किस्सा भी सुन लीजियें..राजौरी का रहीस, गाड़ी-बंगले में बसर करनेवाला..। हम लड़को के सामनें हमेशा शैखी बखार्ता था, कि मैं जब चाहु अपनी किसी गर्ल-फ्रेंड के साथ सेक्स कर सकता हु..कभी-कभी तो दोनो लड़कियों के साथ एक साथ..। फिर एक दिन उसने इसका राज़ बताया।। बाला “ देखो यार जब आप किसी भी लड़की से स्मूच (लिप-किस) करते हैं तो उसकी आंखे बंद हो जाती है..उसी टाइम में अपने सैल-केमरे से MMS बना लेता हु..फिर तो जब चाहे जो मर्जी करों..एक के साथ या दोनो की मार लो..” । ऐसे लड़को की कमी नहीं है जो पहले तो लड़कियों का कस्में देते नहीं थकते फिर उसकी इज्ज़त पर थूक कर आगे भड़ जाते हैं..इसे करते है रज़ामंदी से रेप...। जब लव-यू, किस-यू कहें तो आप और मना करना तो बाप..कि मेरा परिवार नहीं मानेगां और मैं अपने परिवार का साथ नहीं छोड़ सकता..। लड़की अकेली..ठगीं सी..बेबस..क्योकि ये रेप धोलाकुआं पर किसी अंजान ने नहीं उसके प्यार ने किया था..।

देखियें, बलात्कार - सैक्स और समाज का चश्मा जवाब मेरें पहले कथन में ही छीपा है कि ये एक Sexual-Physical मामला हैं। क्योकि एस ताकतवर हमेशा कमजौर को दबाता आया है चाहे मुद्दा मुल्क का हो या मनुष्य का..। Physically हो सकता है कि एक लड़की मार्शल-आर्ट सीखकर दस लड़को को मजा-चखा सके लेकिन दसों लड़िया एक नहीं हो सकती..। Sexual इसलिये कि अगर आमतौर पर लड़किया ज्यादा बलशाली होती हो बलात्कार लड़को का ही होता..। अगर आपको मेरे बातों पर भरोसा नहीं तो मेरे पुरुष-पाठक कभी देर-रात दिल्ली के किसी पांचसितारा होलट, राजपथ, पंडारा रोड़, सीपी या अशोक मार्ग पर ठीक-ठाक कपड़े पहनकर खड़े होकर देखें..। कम से कम दस आलिशान कार को आपने रास्ते पर आकर खड़ी हो ही जाएगीं..। जिसमें से 30-40 उमर की औरतें निकल-कर आपको पैसा ओफर करेगीं..एक रात के 15000 तक मिल सकते हैं। यानीं Sexual मुद्दा पर कोई मतभेद नहीं चाहें मामला जेपी-रोड़ का हो या पंडारा-रोड़ का लड़के और लड़ियां दोनो समान है और सामान भी..खरीदार चाहियें..।

आपके मन मैं दो सवाल उठ करे होगें पहले पंडारा-रोड़ का रहस्य मैं कैसे जानता हु..क्या मै भी जीगोलो को नहीं तो साहब पैशे के पत्रकार होने की वजह से रात भर मीडियां की मंडी और सेक्स का बाजार चलता रहता है और दुसरा सवार बलात्करा पर बहस और ब्लॉग लिखना बहुत आसान होता है..अगर खुद की पत्नी या प्यार के साथ हो तो अक्सर जनाब के पास जबाव नहीं रहता..तो जान लीजियें मेरा जवाब हैं हा..साथ-संबध और शादी भी..डंके की चोट पर..अंतिम सांस तक क्योकि परिवर्तन हमारे बस में हैं....!!!

गुरुवार, नवंबर 11

कनपुरा टू वाशिंगटन – ओबामा लाइव

मैं किसान हूं..पढ़ा-लिखा किसान, सोच के चश्मे से सच को देखना वाला इसलिये नाम बताना जरुरी नहीं समझता क्योंकि नाम में जाति की ज़जीर और मजहब के मायने तलाश लिये जाते है। जगह बताना लाज़मी है क्योंकि ये कहानी का मेरे गांव से वांशिगटंन तक का वास्ता है। मैं कनपुरा का निवासी हूं..नाम अंजान लगा..होता है आप दिल्ली-मुंबई वालो को वैगस और वैनिस के होटलों का नाम पता है देश के दर-दर का नहीं...लेकिन जैसे राहुल के जाने से कलावती का घर ससंद में फेमस हो गया ठीक वैसे ही आबोमा का मेरे गांव से नाता है। नाता रोटी या बेटी का नहीं, कमप्यूटर और इंटरनेट का...। वो महारे गांव प्रधाने 14*14 इंच के मॉनिटर से..क्या दिन था वो..।

मैं रोज़ सुबह अख़बार पढ़ता हूं..पता चला ओबामा साहब इस दफा 250 कंपनियों के मालिकान के साथ भारत आये हैं..निवेशक आये हैं, भला हो अमेरिका का..बीते चुनावों में महारानी मुख्यमंत्री मेरे गांव आईं थी..सड़क बनी थी, नलकूप में पानी था, बच्चों को भरपेट मिड-डे मील मिली थी...सो सोचा इस दफा जब आबोमा आन-लाइन आवेंगे तो महारी तक्दीर ही संवर जावेगी..। वो शिक्षा-कृषि और स्वास्थय की बात करेंगे..यानी बिहार में अब बच्चे जन्मजात अंधे पैदा नहीं होंगे, गांव की पाठशाला में छपला होगा, मेरे लड़की छठी में पढ़ने जावेगी क्योंकि स्कूल में बच्चियों के लिये अलग शौचालय बनेगा..। तभी जयपुर वाले भाई का फोन आया, बोला भाई बाहर देखो तुम्हारा गांव टीवी पर है। मैं निकला तो ईटीवी और सहारा के फटेहाल पत्रकारों की जगह..एनडीटीवी और टाइम्स नाउ के लोग खड़े हैं, कुछ फिरंगी चहरे भी हैं, और गोल-गोल छतरी वाली मोटर-गाड़ी भी...। लगा हो गई काया पलट, दिल्ली और जयपुर से अफसरान आये थे, सबको राम-राम किया और सोचा बराक जी के मै भी सवाल करुंगा आखिर हम दोनों में गांधीवाद का रिश्ता है, मैं शहर से पढ़कर आया हूं, टूटी-फूटी ही सहीं अंग्रेजी आती है।

ये क्या पंचायत घर में जाने के लिये कोई खास आईटी चाहिये मुझे रोका, भला हो चौधरी साहब का जो उनके टोकने पर अंदर जाने दिया। अंदर कुछ जवान बच्चे जोधपुर से मंगवाये हुऐ थे और हमारे गांव के पंच थे जिन्हें दिल्ली वाले साहब नये उजले कपड़े दे रहे थे...। चुप रहने का इंशाला हुआ, लगा ये कैसा दोनो सबसे बड़े लोकतंत्रों का मिलन जहां बोलने की आज़ादी तक नहीं, ओबामा आये अंग्रेजी में बोले मेरे पल्ले तो बस इतना पड़ा की आने वाले मौनसून से पहले हमें उसकी जानकारी की तकनीक मिल जाएगी..। मुझे रहा नहीं गया मेंने पाकिस्तान पर सवाल दागा पर ओबामा ने अनसुना कर दिया..भला ये कैसे गांधीवाद, ओबामा की कलाकारी किसी स्ट्रेसमेन जैसी लगी गाधींगिरी सिखाने की “ पाकिस्तान कि तरफ बुरा मत देखा, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो, चीन के लिये वो माओवदी दबंग है बुरा मत बोलो और भारत गांधीवादी गधा..” जिसे अरबो डालर के रक्षा सौदे करते है दुश्मनों का मारने के लिये लेकिन कृषि पर दिलचस्पी नहीं जिससे उसकी जनता जिंदा रह सके। करोड़ो के एयरक्राफ्ट चाहिये उड़ने के लिये पर बीमारियों से लड़ने के लिये अमेरिकी पेटेंट पर ढील नहीं...।

उसके दस मिनट बाद मीडिया के लोग चले गये, आधे घंटे में अफसरान लौट लिये, एक घंटा होते-होते पंचायत घर पर लगा नया-नवेला वॉल-पेपर उखड़ गया अब वो शाम तक सरपंच के घर की शोभा बढ़ाएगा..फिर मुझसे रहा नहीं गया और घर को लौट लिया..। बालक बताते है कि उस कम्पयूटर पर जिस पर एसएसपी के बच्चे खेलते है, मानों ठेठ देसी शादी की रसमें पूरी हो गई आबोमा की बारात बीत गई और नेट के साथ-साथ रोटी-बेटी का रिश्ता भी टूट लिया। रात में फिर से जयपुर वाले उसी भाई का फोन आया, बोल्यो मैने तुम्हे टीवी पर देखा था, खंडूवा मैला लग रहा था..मै बोला यहां तो लोग या तंत्र क्या सबमें मैल है..उसका बेटा बंबई के ताज़-होटल में काम करता है। वहीं टेलीफोन पर बता रहा था बोला चाचाजी ओबामा ने 2 मिनट का मौत 26/11 वालो के लिये रखा था..ऐसे 257 मौन पहले ही रखे जा चुके है..जब भी होटल में जब भी कोई कोई बड़ा जलसा होता है तो जन-गण-मन की तरह रतन टाटा के निर्देश पर बार-बार मौन होते है..माना हमे सिखाया जाता हो की मौन रहना ही बेहतर है और यहां मुर्दे को नौकरी मिलती है और जिंदा का ठोकरें..।

मेने बचपन में काबुलीवाले की कहानी पढ़ी थी..उस पर फिल्म भी देखी थी जयपुर जाकर शायद तब सोवियत हमले में लुटे-पिटे काबुल वाले अंकल भारत आकर करोबार करते थे आज भी एक सैल्समैन भारत यात्रा पर है..हमारे बिना वोट के पीएम बने मनमोहन उन्हें स्ट्रेसमैन की संज्ञा देते हैं आखिर हमारे सियासी रहनुमाओं को राष्ट्रनिर्माता अर्थ पता होगा भी या नहीं कोई नहीं जानता। और ओबामा सोचते होंगे कि काश मेरे मुल्क को ये आवाम मिल जाये और मुझे Statesman से salesman बनने की जरुरत नहीं होती...हावर्ड को आईआईटी से डर नहीं लगता, बैंगलुरु सिलिकॉनवेली को मात नहीं देता, गिरते वॉलस्ट्रीट की हालत उठते दलाल-स्ट्रीट जैसी होती और चप्पले-जूते चलने वाले संसद में खबर पढ़ने वाली मशीन (teleprounter) लगी होती।

आज कम से कम राहुल गांधी मध्यमवर्ग के लिवाज़ में नज़र आते है, प्रियंका डीयू की स्टूडेंट से कपड़े पहनती है। लालू-मुलायम-शरद परकटियों से खौफ खाते है, आरटीआई से मनमोहन के मंत्रिमंडल महल सा दिखता है, वरुण बंगाली बाला से शादी करते है, गडकरी साहब बीजेपी को पार्टी से एनजीओ बनाना चाहते है ये अंतर है। यहीं फर्क कॉमनवैल्थ के घोटाले के बावजूद खेल हिट हो जाते है, क्योंकि एक भारत वो भी है जो अपनी काबलियत के दम पर अमेरिका में नौकरी पाता है, यूरोप की अर्थव्यस्था को चलाता है, जिसकी दक्षता और डेड-लाइन से चीन भी चौंक जाता है। पर दोनों में अन्तर बहुत है जैसे मेरे कानपूरा के ओबामा और वांशिगटन के ओबामा। एक को तो गांधी के बंदर जैसे मेरे खेत नहीं दिखते, हथियार बेचने का ख्याल नज़र आता है, दवाई नहीं हवाई जहाज बेच जाता है और दूसरे वाशिंगटन के लिये 50 हज़ार रोजगार, अरबो डालर का निवेश ले आता है।

ओबामा एक ही है कनपुरा टू वांशिगंटन, वो सेलसमैन भी है और स्टेसमैन भी पर हमारे नेता उसे समझ नहीं पाते..जैसे आप AC में बैठकर BC करने वाले महिला आरक्षण का रागभैरवी गाते है पर आधी-आबादी की आजादी का नहीं, मुंबई को शांघाई बनाने की धुन है पर विदर्भ को हरियाणा और बुंदेलखंड को पंजाब नहीं..। बस मेरा कनपुरा एक दिन के लिये ही सही पिपली बनकर ओबामा लाइव हो गया.........?

शुक्रवार, अक्टूबर 8

भारत के बदलते भगवान : भोलेबाबा से सांईबाबा

मेरे किसी दोस्त ने फेसबुक पर एक सवाल पूछा था.. “शहरों में भोले बाबा की जगह, सांईबाबा क्यों ले रहे हैं ?“ सवाल बेवजह का लग सकता है, लेकिन बड़ा जरुर हैं। क्या भारत अपने भगवान बदल रहा हैं ? देखियें मै किसी बाबा से निजी सरोकार नहीं रखता। आपकी आस्था का सम्मान है पर उसमें विश्वास नहीं..। फिर भी इस सवाल पर सोचनें लगा – भला क्यों शहरों के बाबा शिव से सांई हो गये..जबकि आज से 20-30 बरस पहले सांई भग्तों की संख्या इतनी नहीं थी।

भोलेभंडारी नाग लपेटे है, राख रमायें है, धूणी चढ़ाये है तो क्या शहरी सभ्यता इसे स्विकार नहीं कर पा रहीं, लेकिन अगर ऐसा हो तो कृष्णा से सुन्दर भगवान भला कौन हो सकते है ?...और सांई भी तो कोई पॉप-स्टार नहीं रहें। फिर सोचा शिव को पंसद करना शायद ज्यादा जटिल रहा होगा..सोमवार का व्रत रखना, बेल-पत्ते से दुध तक की आहुती देना..कॉसमों-कल्चर शहरियों से लिये सरल रही रहता..।

सांई ज्यादा सहज भगवान है..एक साजसेवक की तरह उसका दर्शन है जो आम आदमी के दर्पण को प्यारा लगता है। उन्हें प्रेम से कुछ भी देदें तो वो आपकी मनोकामना पुरी कर देते है..। उसके चमत्कार भी कुछ हद तक अंग्रेजी फिल्मी की तर्ज पर लॉजिकल होते है..हिन्दी फिल्मी-फसाने जैसे नहीं...जिसका कोई सर पैर ना हो..। शिव गंगा को जटाओं में धारण कर सकते है, सागर का विष्पान भी..लेकिन आम आदमी आज इससे सरोकार कम रखता हैं। वो तो अपने रुपयों से कुछ पैसें दान कर समाजसेवा का संवाग रच लेता है और सांई का भग्त कहलाता हैं।

एक दुसरी कारण भी हो सकता है..श्रि.डीं के सांई-संस्था बहुत ओग्नाइंज़ड हैं। समाजसेवा के काम करती है, सांई प्रचार भी और भग्तों से दर्शन तक का टेक्स लिया जाता हैं। ये सांई-धर्म प्रचार की रीत हैं..ठीक वैसे ही जैसे ओग्नाइंज़ड तकनीक से अमेरीका आगे भड़ा..। कभी शैवमत भी इसी तर्ज पर तरक्की पर था। जब शैव अखाड़ें, वैष्णों अखाड़ों से भी आगे थे। चारों शकंराचार्य शिव-उपासक थें और भारत शिवमय हुआ करता था।

इतिहास देखे तो महोम्द-गज़नवी की सोमनाथ-मंदिर पर चड़ाई याद आती है, कैसे शैव-अखाड़ों ने महोम्द की सैना तो दो महिनों तक सोमनाथ को फतह नहीं करने दिया। कैसे किसी सैनिक-लश्कर से चंद हजार भग्तो से लौहा लिया। वो भोलेबाबा के स्वर्ण युग था। मेंने खुद हरिद्वार के कुंभ में देखा था, आज के लोक नागा और शैव अखाड़ो से खौफ़ खाते है। उन्हें देख ऐसे नांक-मुह सिकोड़ लेते है, मानों दिल्ली के किसी वयस्त चौराहे पर भीख मांगते किन्नर को देख लिया हो। उसके लिये बनी श्रृद्धा खो चुकी है और भूत जैसी दिखती काया से लोग खौफ ही खाते हैं।

हांलाकि आज भी कवड़ियों से ट्रेफिक जाम होता है, लोग अपना कर्म करने के लिये दफ्तर लेट पहुचतें हैं..लेकिन अब युवाओं में कवड़ियों के लिये वो भाव नहीं बचा..कैलाषखेर के गानों में मस्ती करनेवालो को, जबरन लीफ्ट लेने वालो को..भला कोई भग्त की संज्ञा दें भी तो कैसे ?

वहीं सांई के नाम पर समाजसेवा कम से कम शहरों में तो जोरों पर हैं। जहां सेवा होगी वहीं शिव होगें और सांई भी...। जहां भगवान और भग्त में दूरियां होगी, पूजा-विधि किसी आफत सी लगेगी। तो उसका हाल वहीं होगा, जो कभी जैन धर्म का हुआ था..बोद्ध ज्यादा सरल धम्म था..उसे भारत से जापान ने चीन, थाईलेड, लंका होते हुऐ धारण किया और जैन दिग्मंबर बनना सबके बुते की बात नहीं थी।

नानी की कहानी याद है - आपको..मीठा खाकर रात में मत निकलना, भूत चिपट जाएगा । आज भी कुछ ऐसा ही होता है। कभी SMS और कभी E-MAIL के नाम पर कहा जाता है कि अगर ये मैसेज आगे नहीं भेजा तो बुरा होगा और भेजा तो आपका प्यार – आपके पास..। नानी की कहानी ..से intel-core-2010 तक बहुत कुछ बदल गया है लेकिन इंसानी फितरत नहीं बदली।

धर्म को मैं मार्कस की तरह अफीम तो नहीं कह सकता लेकिन जब तक धर्म जोड़ने की बात करता हैं, समाज से सरोकार रखता है मै उसके साथ हु..लेकिन 47 का देश, 84 की दिल्ली, 92 के यूपी और 2003 के गुजरात के साथ नहीं..। मेरा वास्ता उस कन्जको से हो सकता है जिससे कुछ गरीब लड़कियों को भर-पेट भोजन मिल जाऐं लेकिन उस नवरात्रों के व्रत से नहीं, जिसके चलते फल-सब्जी और दूध के दाम आसमान पर हो..क्योकि मेरे मुल्क में आज भी आधा-भारत अधुरा पेट सोता है। बात भले ही भोलेबाबा और सांईबाबा से शुरु हुई हो लेकिन इस मुल्क में बातों और बाबा-बापुओं की कोई कमी नहीं..। कुछ जेल में है और कुछ ई-मेल में.. मुझें याद है, बच्चपन में एक ही सरकारी-चैनल होता था दूरदर्शन और एक ही बापू – मोहनदास कर्मचंद गांधी..आज चैनल और बापू बहुत हैं....क्योकि भारत बदल रहा है...!!