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सोमवार, दिसंबर 22

दहक रहे है युवा

दहक रहे है युवा


वो दौर बीत गया जब हमारा सपना था अधेड़ उम्र की दहलीज पर अपनी कार की सवारी और रिटायरमैंट के पैसे से अपने घर खरीदना, आज युवाओं में पैशेंस नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। अजस्ट करते-करते हम 125 करोड़ के पार पहुंच गए, अब मेट्रो से बस की सीट के लिए एजस्ट ही तो कर रहे है । अब सहना मान है और साहस जरुरी । हमारी सौच में वर्क-हार्ड और पार्टी-हार्डर का कॉसेप्ट रहता है, हमें क्रेडिट कार्ड पर खुशियां खरीदें की आदत है। हम 18 घंटे काम को तैयार है बशर्ते महीनें के अंत में सैलरी 6 अंको में मिले । हम जितनी मेहनत खुद करते है उतनी ही सरकार से भी चाहते है, तभी 12 घंटे काम करने वाला सीएम चाहिए और 15 घंटे काम करने वाला पीएम । दहकते है चैंज से लिए, पुरानी पीढ़ी से हमें आजादी विरासत में मिली लेकिन आजादी की उड़ान हमे विकास से भरनी है। अब अमेरिका नहीं जा सकते है पर अपने देश को को वेस्ट से बेस्ट बना सकते है । यह बात हमारी सोच में नज़र आती और सपनों में भी...


ऐसा भी नहीं है कि, हम पुरानी पीढ़ी से सरोकार नहीं रखते, बस शर्त केवल इतनी है कि, उन बुजुर्गों की सोच में भी युवा जोश होना चाहिए , जब अन्ना ने कहा वो नेता नौकर है नौकर और हम जनता मालिक हैहम युवा देहके और फेसबुक की वर्चुअल दुनियां छोड़ रामलीला मैदान से भ्रष्टाचार के खिलाफ महाभारत का ऐलान कर दिया । ऐसा भी नहीं की हमारे जोश को किसी नेता की हर दम जरुरत हो, 16 दिसम्बर को दामिनी की अस्मत पर हमला हुआ और हम अपनी उस बहन के वीरा (भाई) बन विजय-चौक पर पहुंच गए, सत्ता के ठेकेदारों को अपने जूते की ठोकर की धमक दिखाई, इंडियां गेट पर लाठी खाई लेकिन ख़ाख़ी और ख़ादी को इसकदर मजबूर कर दिया कि उन्हे संसद की चौपाल से नारी के सम्मान का बिल पास करना पड़ा ।


हमें अब नेताओ के वादे नहीं इरादें चाहिए , पांच साल तक इंतजार करना हमारी फितरत में शुमार नहीं । जब-जिस पल लगा की सरकार खुद को खुदा समझ रही है, जनपथ पर उतरकर राजपथ जाम कर देगें..। हमारी आवाज़ चैनलों और अख़बारों की मौहताज़ भी नहीं, फेसबुक-टयूटर-यू-टियूब से ही अब रक्तहीन क्रांति का आगाज़ करने की ताकत रखते है। 377 को नहीं मानते, लिव-इन के लिए शादी की शर्त भी मंजूर नहीं, हमने बाबरी पर बावरा होना छोड़ दिया है, हमें मंदिर नहीं मेहनत पर भरोसा है, विकास की भूख है और हमे इंतज़ार का अचार पंसद तक नहीं ।

हमारी दहती सोच के निशाने पर सरकार और सियासत ही नहीं पुरातन समाज और सस्कांर भी है जो स्कूली बच्चियों को सर्कट पेहनें से रोकते है और हमे लगता है 10 बरस की बच्ची की सर्कट से छोटी उनकी सोच है जो उस कन्या में भी वासना का वास देख लेते है। संसद और विधानसभाओं में तो नेता सिर्फ जाति-धर्म की ज़ज़ीर तोड़ने का भाषण देते है पर हम तो लव-मैरिज़ से वर्ग औऱ वर्ण के बंधन तोड़कर जीनें का मंत्र जानते हैं । वो लोग तो आज भी खाने में नोर्थ और साउथ इंडियन की सोच रखते है पर हमे को कॉटीनेंटल पंसद है, ग्लोबल हमारी समझ है और बटावा हमें भाता नहीं ।


जड़ो से प्यार हमें भी है, लेकिन जड़ो में जकड़े जाना मुनासिब नहीं लगता, 15 अगस्त पर अग्रेज़ों के अत्याचार की कहानी बार-बार सुनना हमे बोरिगं लगता है, करेप्शन की कांट लाल-किले के प्राचीर से बताओं तो जानें...। हाथ जोड़ना हमारे संस्कार में है पर हमेशा जुड़े रहे यह जरूरी नहीं , हमे सपनों का भारत नहीं बल्कि सचाई का भारत चाहिए । आरटीआई, आरटीई, फूड-सिक्रोरिटी उनकी भीख नहीं हमारी भूख की वजह से मिला वरना जिन नौकरशाहों को एक सरकारी फाइल पर साइन करने में परेशानी होती है वो सिटीजन-चार्टर के तहत अपनी मर्जी से काम करने लगे यह तो संता-बंता से बड़ा जोक होगा । कुछ लोग कहते है कि युवा जोश हमेऱशा ठोकर का शिकार होता है लेकिन गिरता वहीं है जो दौड़ता है और हमें खड़े-खड़े पाषाण बन जाते है ठोकर खाती नदीं बनता बेहतर लगता है । हमने पड़ोसी पाकिस्तान औऱ श्रीलंका से तुलना करना छोड़ दिया है हमे  चीनी ड्रेगन सी रफ्तार चाहिए और अमेरिकी अंकल सेम सी अरीमी भी ..और हम इसे सिर्फ कहकर नहीं छीनकर लेगें...।
                                            


शनिवार, अक्टूबर 22

RSS गाली क्यों ?


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह किसी NGO या दबाव समूह का नाम कम लक्ष्मण रेखा का नाम ज्यादा    लगता है। RSS ने गुजरात के भुज-भूचाल से औड़िसा के  चक्रवात तक क्या काम किया इसकी चर्चा भी नहीं होती वरण इस बात बहस जरुर होती है कि या तो आप संघी विचारधारा वाले हैं या संघ विरोधी। आजकल संघ के नाम का सवाल कुछ बदल गया है लोग कहते है या तो आप सभ्य नागरिक है या साम्प्रदायिक संघी। संघ एक विचार धारा नहीं एक गाली बन गई है..। शायद यह सबसे बड़ी जीत है नेहरू-गांधी परिवार के वास्ते।



अगर आप वन्देमातरम बोले तो आप साम्प्रदायिक हैं, भारत मां की चित्र को नमन करें तो मुस्लिम विरोधी, अगर भग्वा रंग की निक्कर पहन लें तो देशद्रोही। यहां तक खुद को धर्मर्निपेक्षता का ठेकेदार बताने वालो भी आंतक का रंग काला या हरा नहीं केवल भगवा ही नज़र आता है। RSS एक ऐसी गाली है जिसकी सोच से अन्ना का गोल चश्मा भी चपटा हो जाता है। वो भारत मां की तस्वीर अपने मंच से दूर रखते है। मंच पर गांधी दिखते हैं और शयन कक्ष में विवेकाचंद। आज सब लोग RSS से दूरी बनाना ही बेहतर समझते हैं मानो 18वीं सदी का दलित सामने आ गया है।


जिस RSS से कभी अटल और आडवाणी जुड़े थे, उसकी शाखाओं में संयुक्त भारत (भारत-पाक-बग्लादेश-बर्मा) की तस्वीर लगी होती थी और शाखाओं में दिखती थी जवां-भारत की फौज। आज चंद बूढ़े चंद पार्को में चंद पलों के लिए योग करते दिख जाते हैं। उसके सयुक्त भारत का सपना धुंधला हो चुका है ठीक उसके नेताओ के सफेद बालों की तरह। जब कांग्रेस का प्रधानमंत्री (नरसिम्हा राव) खादी के नीचे भगवा निक्कर पहनते थे वो दौर गुजर चुका है आज तो भगवा किला बने गुजरात में भी RSS के विचार या बीजेपी की सरकारी नहीं मोदी की तानाशाही चलती है। मुझे आज भी गोवा के मंच से अटल के आंसू याद है जब गुजरात जल रहा था और अटल जैसा प्रधानमंत्री भी मोदी को सीएम के पद से हटा नहीं पा रहा था। मेरे ज़हन में कोई और पीएम नहीं आता जो मंच पर रोया हो शायद आजतक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री अटल रहे होंगे मनमोहन नहीं..।



RSS के पतन के पीछे उसकी विचारधारा का ही हाथ है और यही अतंर है कांग्रेस और संघ के बीच। कांग्रेस एक सामंती दल है जिसमे एक राजपरिवार की सत्ता चलती है, जबकि RSS एक विचारधारा। वक्त बदल गया विचार नहीं बदलते और RSS के अंजाम, लेनिन के USSR से जुदा नहीं रहा। आज के युवी नौकरी के लिए सरकार नहीं गैरसरकारी कंपनियों की तरफ देखते है, मंडल और कमंडल दोनो बौने हो जाते हैं। भारत आज बाबरी और राममंदिर नहीं फेसबुक और गूगल के चश्में से देश को देखता है। आज अन्ना का अनशन चलता है आडवाणी का रथ नहीं। वैलनटाइंस डे पर बवाल काटने वालों को युवा पंसद नहीं करते..पर यह बात RSS के नेताओ को समझ नहीं आई या वो सच को भी अपनी पुरात्विक सोच के चश्मे से दिखना चाहते है..। ठीक वैसे ही जैसे लालकिल को अपने बंद और हड़लात की राजनीति पर भरोसा था वो नहीं बदले पर बंगाल बदल गया, इस बदलाव की कीमत उन्होनें साम्यवादी लालाकिले पर ममता की जीत से चुकाई।



लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता RSS एक गाली कैसे बनी? क्या कांग्रेस का हाथ इसके पीछ है? या महज़ यह बीजेपी की हार और संघ के हाल का परिणाम है। इस सवाल के साथ ही दिल और देश में ग्रहयुद्ध छिड़ जाता है। कि जब मुस्लिम बाबरी की बात करें तो वो secular और एक हिन्दू राममंदिर की फरियाद करें तो वो communal. वन्देमातरम यानी मात्रभूमि को नमन अगर कुरान में पाप है तो उसे बदले डालो, बदल डलो या मानने से इंकार कर दो..। ठीक वैसे ही जैसे मनू की सोच से आधी-आबादी और दलितो के देखनी हिन्दूओं से छोड़ दिया है, जिसके लिए संविधान और कानून का सहारा तक लेना पड़ा, क्या ऐसा ही कानून, कुरान के खिलाफ बनाने की बात कर सकते हो ? यदी नहीं तो हाथ के हाकिमो को जम्हूरियत की बाते भी शोभा नहीं देती क्योंकि अभिव्यक्ति का अधिकार ही लोकतंत्र की खूबसूरती है..।



भारत मां की फोटो लगाने वोलों को तथाकथित सभ्यसमाज इस हय की नज़रो के दखता है क्या वहीं नज़र उन्हे कभी बुर्क की कैद और तलाक के फतवे में भी नज़र आती है ? RSS को फांसीवादी करने वालो को कश्मीर के अलगाववादी, ख़लिस्तान के जट-सिख क्यो नज़र नहीं आते। किसी और को गाली देने के RSS की छवि पाक नहीं हो जाती लेकिन काला या सफेद रंग ही देखना नेताओ की फितरत होगी, पत्रकारों के पेशा नहीं है। इसलिए यह भी जताना जरुरी है कि दुनियाभर की विचारधाणाएं रंगीन है बशर्ते आपकी सोच का चश्मा काला ना हो...। जिन यहूदियों को यह सभ्य समाज सफेद मानता है, उनकी हकीकत देखने फिलिस्तीन नहीं भारत के गोवा तक जाना ही बहुत होगा। जहां यहूदी बाहुल इलाको को नग्न-बीच की संज्ञा दी जाती है जहां भारत का कानून हीं यहूदियों के फतवे चलते है।



यहां तक आते-आते सवाल RSS की छवि से बड़ा हो जाता है। सवाल यह कि वन्देमातरम और भारत मां की जय कहने का विरोध करने वालों पर संविधान खामोश क्यों है? सवाल यह कि किताबे चाहे शास्त्र हो या कुरान, अगल बदली नहीं जा सकती को कूड़ेदान में फेंक क्यों नहीं दी जाती। सवाल यह कि जब हिन्दुओ के मंदिर में औरतों को आने का कानूनी अधिकार मिल सकता है और मस्जिदों से आधी-आबादी की दूरी क्यों ? साथ ही सवाल उस खच्चरों पर भी जो मुसलमानों को आवशयक बुराई से ज्यादा कुछ नहीं मानते..। उन्हे सलमान के घर के गणेश नज़र नहीं आते, तिंरगा लिए शारजहां में नाचते दाउद की तस्वीर भी वो भूल चुके है। शारुख की पत्नी गोरी छिब्बर खान है और उमर अब्दुल्ला की पत्नी जो पहले हिन्दू थी आज इस्लाम मानती है और उनकी बहन जो पहले इस्लाम की ईबादत करती थी आज भगवान की पूजा करती है।



सवाल अन्ना और आंतकवाद पर भी है कि आज अन्ना RSS ही नहीं भारत मां के चित्र से ऐसा क्यों भागते हैं मानो किसी छोटे बच्चे को बिजली का झटका लग गया हो। आंतक का चेहरा पंजाब में जट-सिख है, मध्यभारत में आदिवासी, उत्तर-पूर्व में हिन्दू, तमिल में हिन्दू, आयरलैड में ईसाई, मध्य-एशिया में यहूदी, पूर्वी अफ्रीका में नीग्रो हैं और रुस में मुसलमान हैं। जब पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ के पिता हिन्दूमहासभा के नेता हो सकते हैं और कोई उन पर सवाल नहीं उठाता तो अन्ना और RSS के साथ को कलंक क्यो माना जाता है।



मनोवैज्ञानिक कहते है कि जब आप किसी इंसान को दुत्कार दो तो वो हिंसक हो जाता है। क्या सिर्फ एक सामंति परिवार (गांधी-नेहरु) और उसके पप्पुओं के कहने पर हम RSS को एक गाली मानकर वहीं नहीं कर रहे। हमें आजाद हुए आधी सदी से भी ज्याद हो गई है ज़रा सोचकर देखो क्या, आज भी हमे गुलामी की आदत नहीं है ? क्यो कांग्रेस, अकाली, शिवसेना, सपा जैसी परिवारिक पार्टियों में युवराज होते हैं पर बीजेपी के लिए पीएस का सवाल दल में फूट का काम कर जाता है? जब एक पार्टी का युवराज (राहुल) कहता है कि कांग्रेस सेवा दल अब से गांधी टोपी नहीं स्पोर्ट्स कैप पहनेगा और 1885 से चली आ रही रीत बिना की विरोध के बदल जाती है पर वहीं आडवाणी का जिन्ना प्रेम उन्हे नायक से खनलायक बना देता है।



RSS को देखने का चश्मा तभी बदलेगा जब हम भारत के लोग खुद को प्रजा नहीं जनता माननें लगेगी क्योकि किसी देश को कोई बाप या बापू नहीं होता, वन्देमातरम से कोई शर्मसार नहीं होता, किसी लोकतंत्र का कोई युवराज नहीं होता, जनता से बड़ी कोई संसद नहीं होती, धार्मिक किताबों के कच्चे से भारत-निर्माण नहीं होता...और हम से बढ़कर संविधान नहीं होता क्योकि उसी में लिखा है :हम भारत के लोग...








रविवार, अक्टूबर 16

समय का चक्र बना सुदर्शन



कल रात अंग्रेजी फिल्म "V" वीमार्टा देख रहा था..इससे बेहतर फिल्म कभी देखी नहीं और शायद कभी देखने को भी नहीं मिले.."मी अन्ना" के विचार से, "Y4E" के जातिविहीन भारत और आज "Capture the wall street" के विरोध के पीछे एक ही नक़ाब है..रूसो का - हम लोग (We The people) ! इस फिल्म का नायक एक नक़ाब के पीछे है लेकिन उसके पीछे है जनता। जो उसी नक़ाब को नेता और खुद को नायक बना देती है। वो गोलियों से मरता नहीं क्योंकि Ideas are bulletproof.



रा-वन की स्क्रीनिंग महज 4000 प्रिंट्रस के साथ हो रही होगी लेकिन V का प्रिंट आज हर जगह है..लंदन के दंगों में, रामलीला मैदान में, यमन के दमन में, न्यूयार्क के भीड़ में, तहरीक के चौक में, फेसबुक और ट्यूट में, आप में और मुझे में..क्योंकि हम दोनो तरफ एक ही है "मैं"..। आज V के नक़ाब के पीछे कोई एक चेहरा नहीं वो 74 साल का बूढ़ा है जो 42 साल के युवराज से उसकी प्रजा को छीनकर जनता बना जाता है। वो राष्ट्रपति है जो गृह युद्ध से गिरे देश में आधी आबादी (नारियों) के दम पर सेक्स पर रोक लगा देती है और जंग धम से ठम जाती है।



आज पूरी दुनिया एक केनवस है और जनता चित्रकार..साम्यवाद, पूजींवाद, गाँधीवाद, नारीवाद की आंधी से दुनिया आगे निकल गई है। आँखें खोल कर देखो समय का चक्र सुदर्शन बन गया है और प्रजा जनता के रुप में जनसेवकों को उसकी सेवा का ईनाम ग़द्दाफ़ी और राजा के रुप में दे रही है। यह क्रांति इतिहास सबसे बड़ी आग है, मिखाइल गोर्बोच्येव आखिरी सोवियत मुगल होंगे, अनशन से अँग्रेज़ हारे होगें, नासिर से इस्लाम से मायने बदले होंगे पर आज काल कार्ल ज्यादा व्यापक है। जो यूरोप अपने धन के धमक के लिए जाना जाता था वो लंदन के दंगों, यूनान के दिवालियापन, स्पेन की बदहाली, रोम के प्रदर्शनों के मशहूर है। 1991 के बाद विश्व के बेताज बादशाह बना यूएस अपनी ही जनता के हाथों हार रहा है। वो जनता जो कंगाल है, जिसके घर पर फोन है पर दवा के पैसे नहीं, जिनके पास कार पर बे-कारी भी, जिन्हे कल तक भारत और चीन ही नही ओबामा भी आलसी कहते थे आज सड़क पर उतर कर सत्ता को चुनौती दे रहे है।



अफ्रीका जल रहा, खाड़ी देशों की लोकतंत्र की मांग अब अधिकार बनने को है। भारत में एक राजपरिवार के युवराज से ज्यादा फैन एक बूढ़े के है, आज से महज चंद महीनों पहले कोई सोच भी नही सकता था कि एक छोटा, सांवला, खादी पहनने वाला, जिसे ठीक से हिन्दी नहीं तक आती, अगर मेट्रो में मिल जाए तो आप उसे सीट तक न दें..भारत के कथित राजपरिवार को बौना बना देगा। नेपाल में राजशाही जाती रही, बर्मा में सैनिक सत्ता जाने की कगार पर है, राजा जेल में है और मनमोहन महँगाई की मेल में...।





अगर वॉल स्ट्रीट बर्लिन की दीवार बन गई, अगर रामलीला मैदान 10जनपथ को घुटनों पर ले आई, अगर अरब के शेख, जम्हूरियत के फ़क़ीर बन गये, अगर V का नक़ाब, अन्ना की टोपी, तहरीक के यू-टयूब और फेसबुक की जनता जीत भी गई तो आगे क्या ?



सोवियत का रास्ता टूट चुका है, सर्वादय का मार्ग छूट चुका है, समाजवाद के नारा रूठ चुका है...यहां तक हिन्दी फिल्म की तरह V भी जीत के बाद खत्म हो जाती है..। इस हायतौबा के बाद क्या..?  कांग्रेस की हार के बाद क्या ? क्या गारंटी है अरब में लोकतंत्र आने के बाद वहां के नेता भ्रष्टाचार से शेख़ नही बनेगें ? क्या लीबिया कल आज के इराक़ से जुदा होगा या इस समय का चक्र बना सुदर्शन लाशों के ढेर, पार्टियों के पतन, वो ठंडी आँख बनाकर रह जाएगा तो सबकुछ देखकर भी बर्फ सी जमी होती, आपके कलाई की घड़ी की तरह तो चलते हुए भी हाथ पर थमी होती है।



इस जवाब आपके पास ही है, पड़ोस में, सोच में, हर रास्ते में, हर बात में...अगर आप देखने चाहे तो..?  आप सीखने चाहो तो ? आप एहसास करें तो ? बस इस बार नीचे से उपर नहीं बल्कि उपर से नीचे देखते की ज़रुरत है, जरुरत है उसे जीने की, जिस जीवन को आज आप जीने योग्य तक नहीं मानते, उन टीचरों की जिन्हे आज हम सभ्यता का पाठ पढ़ाते है, उस दुनिया देखने की जो हमारे पास है पर हम खुद को उससे दूर करना चाहते है।



हम पढ़े-लिखे लोग, पड़े-पड़े गूगल पर पर्यावरण का पाठ तो पढा करते है पर पड़ोस की झुग्गी में जाकर नहीं देखते कि वो गरीब कैसे हमारे कचरे से पूँजी निर्माण करते है, हम आज भी कार में बैठकर उन्हे बे-कार मानते है और वो धरती को हमारी गंदी से बचाकर उसके ऐसे पैसा कमा जाते है जैसे हम सोच भी नहीं सकते। अगर सत्ता को समझना चाहते हो तो संसद नहीं जगलमहल जाकर देखो, देखो की कैसे जिन्हे हम पिछड़े आदिवासी कहकर दुत्कार देते है वो दिल्ली के दिग्गजों से बदतर शासन करना चाहते है। वहां पेड़ नहीं करते, अमीर और गरीब में अंतर नहीं, लव-मैरिज़ शिव के मेलो में होती है, दहेज़ का सवाल नहीं उठता, न्याय पंच करते है और सजा समाज देता है।



शायद आपके और मेरे लिए झुग्गी या जगलमहल में जाने से सरल है काम से घर पर जाता और घर से काम पर आना..इसी तरह जीना और मर जाना..। लेकिन कम से कम शाम को काम से घर लौटते वक्त उन पंछियों को तो निहार सकते है जो साथ उड़ते है और हम साथ चल भी नहीं सकते..। देखना ज़रूर क्या पता उस डूबते सूरज में आपको कल के सवेरे की झलक दिख जाए..। V कोई और नहीं WE हम है..।


गुरुवार, अगस्त 11

अशनश और आरक्षण : गांधी बन्दर अब हल्ला बोल..

मोहन दास गांधी ने कभी सोचा नहीं होगा की बुरा ना देखो, सुनो और बोलो कहने वाले उनके बंदरों को आज का आम-आदमी अपनी आदत में शुमार कर लेगा..। बस वो बंदर बहरा, अंधा और गूंगा बन चुका है। जो हर बदलाव से डरता है, हर बात से बचता है और सच से छुपता है।

खुद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के ख़ुदा (नेता) कहने वालो ने लोकतंत्र (आवाम की आत्मा) हत्या कर दी और अब वो पोस्टमार्टम भी नहीं करवाना चाहते। उन्हे हर उस बात से डरते है जो संवेदनशील है। वो जनता की संवेदना का ही कत्ल करना चाहते है ताकि जनता प्रजा नामक सूअर बनकर रोज रोजी-रोटी में जीते रहे और चुनाव के बाद वोटो की माला पहनाकर उसी सूअर की बलि दे दी जाती है।  वो SEX-Edu पर बात नहीं करते, समलैंगिकता पर बहस से बचते है, 84 की दिल्ली और 03 के गुजरात पर आम-राय नहीं बनाते और आरक्षण-अनशन पर उनके अल्फाज़ों का ही अंत हो जाता है।

किताबों पर पढ़ा था लोकतंत्र में उदारता होती है, संवाद और बहस का मौका मिलता है..पर शायद किताबों का किस्सा किसी और देश के लिए रहा होगा..। वो ख़ुदा (नेता) डेली-बेली में मां-बहन की सुन सकते है, प्यार के पंजनामें में नंगा-नाच देख सकते है, फिल्मों के नाम अगर कमीने हो तो भी उन्हे कोई दिक्कत नहीं पर..आरक्षण पर बात करना भी उन्हे गंवारा नहीं..। फिल्म में मौलिक सवाल उठाया गया था कि जब पिछड़े आपके घर की सफाई कर सकते है, खेतों में काम कर सकते है, आपकी ट्टी तक उठा सकते है तो उनकी मेहनत पर किसी को शक नहीं होना चाहिए साथ ही यह बात भी उतनी सच है कि विकास के लिए आरक्षण की बैसाखी नहीं मैरिट के पैमाने की जरुरत है।

लेकिन हमारे नेताओं को यह विषय ही गलत लगता है। क्योंकि यह जातिवाद और आरक्षण पर सवाल उठाता है। साहब जब जाट आरक्षण के नाम पर रेल को जाम कर रहे थे, गुर्जर और मीणा राजपूताना को जला रहे थे। जब मंडल वाले सरकार चला रहे थे तब किसी भी नेता को आरक्षण के नाम पर जातिवाद फैलाने की याद क्यों नहीं आई ? क्यो आगे बढ़ते भारत में साल-दर-साल कुछ जातियां पिछड़ जाती है ? इसपर कोई नेता सवाल क्यों नहीं उठाता ! जाति के नाम पर बनी खाप-पंचायतें देश का कानून को कचरे की टोकरी में डालकर अपना फतवा सुनाती है तो किसी को सविंधान की याद क्यो नहीं आती ?


सिर्फ इसलिए की यह एक सवेंदनशील मुद्दा तो इस पर बहस नहीं हो सकती। इसलिए स्कूलों में sex-edu नहीं देनी चाहिए फिर चाहे भारत दुनियां में सबसे आबादी वाला देश बने या एड्स के मरीज़ो का नया विश्व किर्तिमान बनाए, संसद के बाहर लोकपाल पर बहस मंज़ूर नहीं है फिर चाहे नेताओ के घोटाले 2 लाख करोड़ के हो या वो पूरे मुल्क को बेचे दें...। इसे लोकतंत्र नहीं लाशतंत्र कहा जा सकता है, जिसमें हर शख्स एक जिंदा लाश है, जिसे जब चाहे पुलिस वाला लात मार सकता है, सरकारी बाबू भ्रष्टाचार के नाम पर उसकी जेब काट सकते है, नेताओं के नियम उसकी नियती तय सकते है और वो गांधी जी के बंदर की तरह मुंह-आख-कान बंद करके जिंदा लाश बना रहता है।

लाशों के लोकतंत्र में आपका स्वागत है, जहां रह लाश आपको जी-कर मरना सिखाती है, कोई कहता है कि आरक्षण और अशनश दिखाने वालो की मत सुनो..। जो सरकार चाहे सविंधान की दुहाई देकर किसी फिल्म के बैन कर दें, पर क्या अभिव्यक्ति का अधिकार भी उसी सविंधान में नहीं लिखा ? क्या शांतिपूर्ण अशनश उसी सविंधान के मौलिक अधिकारों में दर्ज नहीं हैं ?  मैने शुरुआत में नेताओं को ख़ुदा कहा था, उसके गहरे अर्थ हैं वो हिन्दुओं के मनु और मुसलमानों के ख़िलाफ़ा की तरह सविंधान को किसी धार्मिक पुस्तक बनाकर इस्तेमाल करते रहते हैं और हम गांधी जी बंदर अपना मुंह उसके हर फतवे पर बंद रखना ही बेहतर समझते है ।

लाशों के लोकतंत्र में कुछ लाशें कहती है कि लोकपाल से कुछ नहीं बदलने वाला, हर एक अधिकारी और बढ़ जाएगा जिसे रिश्वत देनी होती, कल तक जो काम 50रुपये की रिश्वत से होता था लोकपाल के बाद 100रुपये देने होगें, आखिर 50रुपये कि रिश्वत तो लोकपाल का हक होगा। कुछ सियानी लाशें यह भी बताती है कि सविंधान की आत्मा है न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में शक्ति-संतुलन कायम रखने में है...जो लोकपाल आते ही बिगाड़ा जाएगा। लोग यह भी कहते हैं कि प्रकाश झा फिल्म से पैसा कमाना चाहता है और फौज में ड्राइवर रहा अन्ना क्या जाने लोकपाल बिल की बात..।

मैं उस लोकतंत्र की लाशों से एक सवाल पूछना चाहता हूं, आजकल बच्चे अपने मां-बाप की कद्र नहीं करते तो क्या वो बच्चे पैदा करने छोड़ देगें ? या अगर घी-दूध-सब्जी-फल-अन्न में मिलावट होने लगी तो क्या उन्होने भूख हड़ताल कर ली थी ? नहीं ! तो फिर लोगों को यह समझना चाहिए कि व्यवस्था की कब्र खामोशी की नींद से बेहतर होगा..अमनो के लिए, सपनों के लिए लड़ना..। जब एक फौज के रिटायर ड्राइवर (अन्ना हज़ारे) बुढ़ापे में भुखे रहकर लड़ सकता है, जब इस फिल्म निर्माता अपनी फिल्म और पूंजी को दाव पर लगाकर लड़ सकता है तो 125 करोड़ जिंदा लाशे क्यों नहीं...

लोकपाल से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, RTI के बाद भी घोटाले होते है पर बंदर बनकर अंधे-गूगें और बहरे होने से, लोकतंत्र की जिंदा लाश बनने से, काम से घर और घर से काम पर जाने से, रिश्वत को सुविधा-कर मानने से, एक फिल्म पर पाबंदी लगाने से, एक अर्थशास्त्री को भगवान मानकर देश को दिवालिया बनाने से, लाल-सलाम के आतंक को सहने से, अफ़जल-कसाब को जेल में खिला-पिलाकर पालने से, सरकारी बाबुओ को गाली देकर भी उसी सरकारी नौकरी को पाने से, खैराती अस्पताल में अपनो को मरते देखने से, राम के नाम पर इमारतों को तोड़ने से, बुर्क़े और घूंघट में घुटने से, टूटे सपनों का मातम बनाने से, अधूरे अधिकारों की चिता जलाने से..लड़कर मर जाना बेहतर होगा..। शांति से लिए युद्ध ज़रूरी है और लोकतंत्र में जंग हथियारों से नहीं हौसले से लड़ी जाती है..। गांधी जी के बंदरों अब हल्ला बोलो....!!