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शुक्रवार, मार्च 18

राष्ट्र तो चाहिए राष्ट्रपति प्रणाली





90 के दशक का दौर था, जब हमारी सिसायत एक युवा (अपेक्षाकृत) प्रधानमंत्री के हाथों में थी, राजींव की सोच में गांधीवाद की चाहत भी थी..73वां 74वां संविधान संशोधन भी हुआ की सत्ता का विकेद्रीकरण हो क्योकि इसके पहले के पीएम के लिए कहा जाता था की वो पौधों (नेताओं) की जड़ों को रोड़ उखाड़कर देखती है, सभी सीएम की शक्ति का स्रोत केवल आयरंन लैडी के पास था लेकिन अब, कांग्रेस के एक दलिये राज के दिन लग गए थे। बंगाल और केरल लाल थे और पंजाब, हरियाण, यूपी, बिहार समेत कई राज्यों में क्षत्रिये दल सिर उठा रहे थे। तब नेताओं को लगता था की क्षेत्रियें विकास का सरोकार क्षेत्रिय दलों साध सकते है। निकाय और पंचायतों में भी गांधी का स्वराज और वेदों का ग्राम गंणतत्र नज़र आने लगा।









लेकिन आज के हालात जुदा है, संयुक्त मोर्चे की सरकार ने साल-साल के पीएम देश को दिए, बीजेपी विपक्ष में थी और कांग्रेस महज़ तीसरे मोर्चे की बैसाखी, मुलायम-लालू जैसे सीएम ना सिर्फ पीएम बनना चाहते थे बल्कि पीएम कौन होगा यह भी वहीं तय करते थे..अटल सरकार में किश्तो में ही रही 6 साल तो चली लेकिन गंटबंधन धर्म के चक्कर में विमान अपहरण या संसद, अक्क्षरधाम, विधानसभा पर आंतकी हमले लचर गटबंधन की सरकार लाचार ही दिखाई दी, मनमोहन सिंह भी अमेरिका के साथ परमाणु करार लैफ्ट के लाल झंडे की वज़ह से नहीं कर पा रहे है और अगरबारी मंत्रियों के लिए हुई गंटबंधन की बात को राडिया के फोन से देश ने देखा । 



इतिहास के संकेत साफ है की जब तक इंद्रिरा, मोदी जैसी ताकवतर छवि और सरकार के सुप्रीमों होगें हम आप्रेशन ब्लु स्टार के बाद भी भारत की एकता बनीं रहेगी, जाट हरियाणा को जलाकर भी दिल्ली को दहला नहीं पाएगें, लेकिन अगर भविष्य में फिर सत्ता की धुरी सीएम बन जाए तो..



मैं खुद देखा उन राज्यों के नेताओं को जहां हर दूसरे घर में फौजी होता और वहीं कहते की अगर राज्य नहीं बना तो चीन से सीमा का दिल्ली ही ख्याल रखें, आध्रा का संकट, गौरखालैंड का आंदौलन किस अगर हिंसक हो सकता सबसे देखा है। हमे भारत को राष्ट्रों का समुह नहीं बल्कि एक राष्ट्र के तौर पर विक्सित करना होगा जो मौजूदा सांसदीये प्रणासी से मुंकिन होता दिखता नहीं..। भारत की विभित्ताओं को ब्रिटेन, फ्रांस जैसे से नहीं तोलना चाहिए जहां एक धर्म, एक भाषा के लोग संसदीये तरीके से सरकार बनाते है, ब्लकि अमेरिका जहां भाषा, विचार, वर्गों की बहुल से राष्ट्रपति आधारिक व्यवस्था है।  



कुछ जानकार कहेगें की हमारे संविधान निर्माताओं से सोच-समझकर ही ससंदीये प्रणासी रखी होगी, लेकिन वो मेरे विरोधी बल्कि पिता तुल्य है, जैसे एक बालक अपने पिता के कंधों पर खड़ा होकर अपनी दृष्ट्री को उनसे अधिक व्यापक कर लेता है वैसे ही हम भी कर सकते है, नुतन विचार और पुरातर सोच का संगम । वैसे भी संविधान निर्माताओं से तो आरक्षण की सीमा 10 वर्ष और 10 सालों में ही हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की सोची थी, पर होना सका यानी सोच तभी सार्थक है जब परिवर्तित हो रहें ।

 
अब ऐसा भी नहीं है की यह केवल विचार भर है, इस विचार के पीछे कुछ पूर्व मंत्रियों की सहमति है जो 10जनपथ और 12तुगलक लेन के बेहदकरीबी मानें जाते है और आधार भी है की अगर मोदी के मन में यह बात तो अगला चुनाव में देश की जनता प्रधानमंत्री के नाम पर नहीं ब्लकि राष्ट्रपति के लिए वोट डाल सकती है, आखिर देश बड़ा है, अनेकता से भरपूर भी जिसे एकता के सूत्र में बांधने के लिए ताकवर ऐसा केंद्र चाहिए जो पाक जैसे मुल्कों को ना सिर्फ कड़ी ज़बान में जवाब दे ब्लकि राष्ट्रहित में उसे चीरने की ताकत भी रहे । इसपर जनमत बनाने की जरुरत है क्योकि जब भारत मां की जय पर राजनीति होनें लगे तो भारत को एक करने वाली प्रणाली की जरुरत पर जोड़ देना लाज़मी है । 

शनिवार, अक्टूबर 22

RSS गाली क्यों ?


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह किसी NGO या दबाव समूह का नाम कम लक्ष्मण रेखा का नाम ज्यादा    लगता है। RSS ने गुजरात के भुज-भूचाल से औड़िसा के  चक्रवात तक क्या काम किया इसकी चर्चा भी नहीं होती वरण इस बात बहस जरुर होती है कि या तो आप संघी विचारधारा वाले हैं या संघ विरोधी। आजकल संघ के नाम का सवाल कुछ बदल गया है लोग कहते है या तो आप सभ्य नागरिक है या साम्प्रदायिक संघी। संघ एक विचार धारा नहीं एक गाली बन गई है..। शायद यह सबसे बड़ी जीत है नेहरू-गांधी परिवार के वास्ते।



अगर आप वन्देमातरम बोले तो आप साम्प्रदायिक हैं, भारत मां की चित्र को नमन करें तो मुस्लिम विरोधी, अगर भग्वा रंग की निक्कर पहन लें तो देशद्रोही। यहां तक खुद को धर्मर्निपेक्षता का ठेकेदार बताने वालो भी आंतक का रंग काला या हरा नहीं केवल भगवा ही नज़र आता है। RSS एक ऐसी गाली है जिसकी सोच से अन्ना का गोल चश्मा भी चपटा हो जाता है। वो भारत मां की तस्वीर अपने मंच से दूर रखते है। मंच पर गांधी दिखते हैं और शयन कक्ष में विवेकाचंद। आज सब लोग RSS से दूरी बनाना ही बेहतर समझते हैं मानो 18वीं सदी का दलित सामने आ गया है।


जिस RSS से कभी अटल और आडवाणी जुड़े थे, उसकी शाखाओं में संयुक्त भारत (भारत-पाक-बग्लादेश-बर्मा) की तस्वीर लगी होती थी और शाखाओं में दिखती थी जवां-भारत की फौज। आज चंद बूढ़े चंद पार्को में चंद पलों के लिए योग करते दिख जाते हैं। उसके सयुक्त भारत का सपना धुंधला हो चुका है ठीक उसके नेताओ के सफेद बालों की तरह। जब कांग्रेस का प्रधानमंत्री (नरसिम्हा राव) खादी के नीचे भगवा निक्कर पहनते थे वो दौर गुजर चुका है आज तो भगवा किला बने गुजरात में भी RSS के विचार या बीजेपी की सरकारी नहीं मोदी की तानाशाही चलती है। मुझे आज भी गोवा के मंच से अटल के आंसू याद है जब गुजरात जल रहा था और अटल जैसा प्रधानमंत्री भी मोदी को सीएम के पद से हटा नहीं पा रहा था। मेरे ज़हन में कोई और पीएम नहीं आता जो मंच पर रोया हो शायद आजतक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री अटल रहे होंगे मनमोहन नहीं..।



RSS के पतन के पीछे उसकी विचारधारा का ही हाथ है और यही अतंर है कांग्रेस और संघ के बीच। कांग्रेस एक सामंती दल है जिसमे एक राजपरिवार की सत्ता चलती है, जबकि RSS एक विचारधारा। वक्त बदल गया विचार नहीं बदलते और RSS के अंजाम, लेनिन के USSR से जुदा नहीं रहा। आज के युवी नौकरी के लिए सरकार नहीं गैरसरकारी कंपनियों की तरफ देखते है, मंडल और कमंडल दोनो बौने हो जाते हैं। भारत आज बाबरी और राममंदिर नहीं फेसबुक और गूगल के चश्में से देश को देखता है। आज अन्ना का अनशन चलता है आडवाणी का रथ नहीं। वैलनटाइंस डे पर बवाल काटने वालों को युवा पंसद नहीं करते..पर यह बात RSS के नेताओ को समझ नहीं आई या वो सच को भी अपनी पुरात्विक सोच के चश्मे से दिखना चाहते है..। ठीक वैसे ही जैसे लालकिल को अपने बंद और हड़लात की राजनीति पर भरोसा था वो नहीं बदले पर बंगाल बदल गया, इस बदलाव की कीमत उन्होनें साम्यवादी लालाकिले पर ममता की जीत से चुकाई।



लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता RSS एक गाली कैसे बनी? क्या कांग्रेस का हाथ इसके पीछ है? या महज़ यह बीजेपी की हार और संघ के हाल का परिणाम है। इस सवाल के साथ ही दिल और देश में ग्रहयुद्ध छिड़ जाता है। कि जब मुस्लिम बाबरी की बात करें तो वो secular और एक हिन्दू राममंदिर की फरियाद करें तो वो communal. वन्देमातरम यानी मात्रभूमि को नमन अगर कुरान में पाप है तो उसे बदले डालो, बदल डलो या मानने से इंकार कर दो..। ठीक वैसे ही जैसे मनू की सोच से आधी-आबादी और दलितो के देखनी हिन्दूओं से छोड़ दिया है, जिसके लिए संविधान और कानून का सहारा तक लेना पड़ा, क्या ऐसा ही कानून, कुरान के खिलाफ बनाने की बात कर सकते हो ? यदी नहीं तो हाथ के हाकिमो को जम्हूरियत की बाते भी शोभा नहीं देती क्योंकि अभिव्यक्ति का अधिकार ही लोकतंत्र की खूबसूरती है..।



भारत मां की फोटो लगाने वोलों को तथाकथित सभ्यसमाज इस हय की नज़रो के दखता है क्या वहीं नज़र उन्हे कभी बुर्क की कैद और तलाक के फतवे में भी नज़र आती है ? RSS को फांसीवादी करने वालो को कश्मीर के अलगाववादी, ख़लिस्तान के जट-सिख क्यो नज़र नहीं आते। किसी और को गाली देने के RSS की छवि पाक नहीं हो जाती लेकिन काला या सफेद रंग ही देखना नेताओ की फितरत होगी, पत्रकारों के पेशा नहीं है। इसलिए यह भी जताना जरुरी है कि दुनियाभर की विचारधाणाएं रंगीन है बशर्ते आपकी सोच का चश्मा काला ना हो...। जिन यहूदियों को यह सभ्य समाज सफेद मानता है, उनकी हकीकत देखने फिलिस्तीन नहीं भारत के गोवा तक जाना ही बहुत होगा। जहां यहूदी बाहुल इलाको को नग्न-बीच की संज्ञा दी जाती है जहां भारत का कानून हीं यहूदियों के फतवे चलते है।



यहां तक आते-आते सवाल RSS की छवि से बड़ा हो जाता है। सवाल यह कि वन्देमातरम और भारत मां की जय कहने का विरोध करने वालों पर संविधान खामोश क्यों है? सवाल यह कि किताबे चाहे शास्त्र हो या कुरान, अगल बदली नहीं जा सकती को कूड़ेदान में फेंक क्यों नहीं दी जाती। सवाल यह कि जब हिन्दुओ के मंदिर में औरतों को आने का कानूनी अधिकार मिल सकता है और मस्जिदों से आधी-आबादी की दूरी क्यों ? साथ ही सवाल उस खच्चरों पर भी जो मुसलमानों को आवशयक बुराई से ज्यादा कुछ नहीं मानते..। उन्हे सलमान के घर के गणेश नज़र नहीं आते, तिंरगा लिए शारजहां में नाचते दाउद की तस्वीर भी वो भूल चुके है। शारुख की पत्नी गोरी छिब्बर खान है और उमर अब्दुल्ला की पत्नी जो पहले हिन्दू थी आज इस्लाम मानती है और उनकी बहन जो पहले इस्लाम की ईबादत करती थी आज भगवान की पूजा करती है।



सवाल अन्ना और आंतकवाद पर भी है कि आज अन्ना RSS ही नहीं भारत मां के चित्र से ऐसा क्यों भागते हैं मानो किसी छोटे बच्चे को बिजली का झटका लग गया हो। आंतक का चेहरा पंजाब में जट-सिख है, मध्यभारत में आदिवासी, उत्तर-पूर्व में हिन्दू, तमिल में हिन्दू, आयरलैड में ईसाई, मध्य-एशिया में यहूदी, पूर्वी अफ्रीका में नीग्रो हैं और रुस में मुसलमान हैं। जब पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ के पिता हिन्दूमहासभा के नेता हो सकते हैं और कोई उन पर सवाल नहीं उठाता तो अन्ना और RSS के साथ को कलंक क्यो माना जाता है।



मनोवैज्ञानिक कहते है कि जब आप किसी इंसान को दुत्कार दो तो वो हिंसक हो जाता है। क्या सिर्फ एक सामंति परिवार (गांधी-नेहरु) और उसके पप्पुओं के कहने पर हम RSS को एक गाली मानकर वहीं नहीं कर रहे। हमें आजाद हुए आधी सदी से भी ज्याद हो गई है ज़रा सोचकर देखो क्या, आज भी हमे गुलामी की आदत नहीं है ? क्यो कांग्रेस, अकाली, शिवसेना, सपा जैसी परिवारिक पार्टियों में युवराज होते हैं पर बीजेपी के लिए पीएस का सवाल दल में फूट का काम कर जाता है? जब एक पार्टी का युवराज (राहुल) कहता है कि कांग्रेस सेवा दल अब से गांधी टोपी नहीं स्पोर्ट्स कैप पहनेगा और 1885 से चली आ रही रीत बिना की विरोध के बदल जाती है पर वहीं आडवाणी का जिन्ना प्रेम उन्हे नायक से खनलायक बना देता है।



RSS को देखने का चश्मा तभी बदलेगा जब हम भारत के लोग खुद को प्रजा नहीं जनता माननें लगेगी क्योकि किसी देश को कोई बाप या बापू नहीं होता, वन्देमातरम से कोई शर्मसार नहीं होता, किसी लोकतंत्र का कोई युवराज नहीं होता, जनता से बड़ी कोई संसद नहीं होती, धार्मिक किताबों के कच्चे से भारत-निर्माण नहीं होता...और हम से बढ़कर संविधान नहीं होता क्योकि उसी में लिखा है :हम भारत के लोग...








गुरुवार, जुलाई 15

सपेरो के देश नहीं, संसान का गुरु है - भारत

संसार भारत को विश्वगुरु की संज्ञा देता है, अर्थात विश्व को ज्ञान और विज्ञान का पाठ पढ़ाने वाला अध्यापक। समूचे विश्व धरातल के रंगमंच पर हमारे मुल्क का किरदार भी एक टीचर जैसा ही रहा है। उसके कभी प्रीचर बनने की कोशिश नहीं की। भारत ने कभी नहीं विश्व को कभी नहीं बताया कि उसके विज्ञान का अविष्कार मिस्र के फैरो से पहले, मसोपोटामिया की कब्रों से पहले, एथेंस के शहरों से पहले, चीन की दीवार से पहले, रोम की रियासत से पहले, सिधुं और गगां के मैदानो में हुआ था।

दुनिया के बेहतरीन शहर न्यूयार्क के नगरों में जल निकास(नालियों) की व्यवस्था के पीछे हड़प्पा की जल निकास व्यवस्था का हाथ है। जिसकी नालियां सात से दस फुट चौड़ी और दो फुट गहरी थी, उसे कपास और पत्थर से ढका जाता है। न्यूयार्क ही नहीं महोब्त और नाव के शहर वेनिस की सोच भी सिधुंघाटी सभ्यता के विज्ञान की देन हैं । जिसमें 2700 ईसापुर्व में ही संसार के सबसे बड़े स्नानागार का निर्माण किया गाया था। चीन की महान दीवार बनने से दो हज़ार साल पहले ही बालाकोट में मजबूत ईटो की भट्टियां रहा करती थी। सिकंदर का देश स्पाटा खुद को युद्ध कला का सबसे बड़ा कलाकार भले ही माने लेकिन तलवार की खोज भारत ने 2300 ई.पू में ही कर ली थी। रोमनो की खेती की नींव भी भारत के हल से पड़ी थी, जिसका अविष्कार 1900 ई.पू में हो चुका था। जिस पेरिस के आइफिल टावर को सात अजूबो में शुमार किया गया है। लोहे की इस इमारत में जंग ना आने की वजह कभी किसी के जहन में नहीं आई। इस संदर्भ में आपको बता दें कि इसके पीछे भी भारत का विज्ञान है। ठीक वैसे ही जैसे अशोक का लौह स्तंभ हजारों साल पुराना होकर भी जंग से अछूता है।

लेकिन फिर भी अगर आपको यह अविष्कार और खोज शुद्ध विज्ञान नहीं लगते तो याद रहे भारतीय विज्ञान की फेहरिस्त किसी फलसफे से भी लम्बी है। आधुनिक चिकित्सा के जन्म से पहले 1500 ई.पू में ही भारत में मोतियाबिंद का ईलाज मुमकिन था, जिसके लिये गर्म मक्खन की पट्टियों का इस्तेमाल किया जाता था। रोम के लोग कांच के गिलास को भारत में आकार लेते थे, नैश का पशु चिकित्सा विज्ञान उस वक्त अतुल्य था, अजंता की गुफाओं में उखेरे चित्रों के रंग बेजोड़ थे। यह प्रमाण है की भारत सदा से विश्वगुरु रहा है चाहे वो लिच्छवी-गंणतंत्र की कला हो, चाणक्य के अर्थशास्त्र की राजनीति, तक्षशिला-नांलगा का ज्ञान या आर्यभट और भास्कराचार्य का विज्ञान।

प्राचीन भारत से नहीं मध्यकालीन हिन्दुस्तान भी विज्ञान के ज्ञान से अछूता नहीं रहा। जब समूचा युरोप अंधकारयुग में लीन था, चर्च के घंटो के आगे गैलिलियों की गोल धरती चपटी हो जाती थी, न्यूटन के नियमों को रोमन सामंत झूठा करार दे रहे थे, तब भी इस मुल्क ने विकास के नये पैमाने तय किये गये थे। दुनियां बारुद की खोज का श्रेय भले भी चीन को देती हो, लेकिन दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में इसके खोज चीन से कहीं पहले की गई थी। प्रशा तलकालीन जर्मनी, ब्रिट्रेन और नेपोलिनय बोनापाट के फ्रांस के पहले कागज़ के नोट दिल्ली में चलते थे। दुनियां में पहली बार महुम्द बिन तुगलक ने काग़जी मुद्रा की शुरुआत करवाई थी। 1782 में टीपू सुल्तान के पिता हैदरअली अपनी सेना में शॉट गन का इस्तेमाल करते थे, जिसकी ताकत को दुनिया प्रथम-विश्वयुद्ध तक पहचान भी नहीं पाई। उसी दौर में मराठा सेना राकेट के प्रयोग में निपुण हो गई थी, हालांकि संसार इसे चलाना एडॉल्फ हिटलर के काल में सीख पाया। दिल्ली और जयपुर के जंतर-मंतर खगोल विज्ञान की प्रयोगशाला ही नहीं, उस काल में संसार की सबसे सटीक घड़ी भी रहे है।

कुछ लोगों का भारत के लिये मानना है की जब सूर्य पश्चिम में उदित होता है तो पूर्व में काली रात की शुरुआत हो जाती है। अर्थात जब पूंजीवाद और उद्योगीकरण से लंदन और पेरिस आबाद हुये तब तक भारत का विज्ञान बर्बाद हो चुका था। ऐसे विज्ञानों को भारत के विज्ञान से पहले अपने ज्ञान की खोज-खबर कर लेनी चाहिये। पेड़ो-पोधो में जान होती है, इस ज्ञान को बुद्घ और माहावीर जी सदियों पहले ही अपने अनुयायियों को दे चुके थे। लेकिन 1920 में जगदीश चंद्रबोस ने विश्व में पहली बार अपने वैज्ञानिक प्रमाण से साबित कर दिया। सी.वी.रमन, होमी भाभा, विक्रम साराभाई के हुनर और विज्ञान का लोहा सारा संसार मानता है।

आजादी के बाद भारत के कदम भविष्य के रास्ते पर जब नहीं रूके तो पश्चिम ने उसके रास्ते पर रोड़े डालने की कोशिशें जरुर की। पश्चिम के देशों का मानना था कि आखिर तीसरी दुनिया का पिछड़ा देश, कैसे दुनिया के विज्ञान में आगे हो सकता है। जब अमेरिका ने अपने बेकार लाल गेंहू यानी पीएल-480 हमें भीख में मुहैया कराये तो हमने हरित-क्रांति की राह खोज ली। जब खेती के लिये हमें बिजली की कमी खली तब हमने भाखड़ा-नांगल बाधं बनाया जो दुनिया भर में बेजोड़ है। जब पाकिस्तान और चीन कश्मीर की सीमा पर अपनी सेनाओं को बढ़ाने लगे तो हमने संसार के सबसे ऊंचे लेह-लद्दाख हाइ-वे के निर्माण कर डाला। तारापुर में न्यूक्लियर इंधन देने में विदेशी सरकारें आना-कानी करने लगी तो भारत ने पोखरण-एक में खुद ही परमाणु परीक्षण कर डाला। 1998 के पोखरण-दो के बाद जब पश्चिम अपनी पूजीं और विज्ञान पर अकड़ जमाकर भारत पर प्रतिबंध लगा रहा था तो हमने स्वदेशी लड़ाकू हवाई जहाज तेजर, बीजींग तक मार करने वाली अग्नि-3 और अंतरिक्ष में भारत को उड़ान भरने के लिये जीएसएलवी और पीएसएलवी लॉच सेटेलाइट बना दिये।

भारत के विज्ञान की गाथा यहीं नहीं रुकी। दुनिया का तीसरा सुपर कम्प्यूटर – परम2000 हमारे देश में बना, एम्म का नाम एशिया के बहतरीन मेडिकल-कॉलजों में शुमार है। आईआईटी और आईआईएम की धाक समूचा विश्व मानता है। बीएचयू, डीयू, जेएनयू ज्ञान और विज्ञान के महान केंद्र है। नासा में 34% , माईक्रोसोफ्ट में 31% , आईबीएम में 27% भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर हैं। यूरोप और अमेरिका में हर तीसरा डॉक्टर हिन्दुस्तानी है। आज भारत दुनिया की छठी अंतरिक्ष शक्ति, पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, चौथी सैन्य ताकत है। यह तो महज आगाज़ है प्रथम पंक्ति के भारत का। भारत में ज्ञान दिलों में और विज्ञान दिमाग में दौड़ता है। सुई से लेकर एटम बम इस देश में बनाये जाते है। संसार इसे विश्वगुरु यू ही नहीं कहता। भारत बीते हुये कल से आने वाले कल की तरफ एक बार फिर समूचे विश्व को भविष्य के विज्ञान के रास्ते पर लेकर आगे बढ़ रहा है।

बुधवार, जून 2

मुहब्बत का मुल्क या दौलत का देश

है प्रीत जहां की रीत सदा, हर 15 अगस्त और 26 जनवरी के आस-पास ये गाना फिज़ा में घुलनें लगता है। एक पुराना गाना और है जो ठीक मनोज कुमार की पूर्व-पश्चिम की तरह देर रात कभी-कभार एफएम में बज जाता है.. “मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं” लेकिन आज इनं गीतों की तर्ज पर ये बाते भी पुरानी पड़ गई है। भारत कुमार बीत गये, राधा आज राखी बन गई, जिसका संवर बार-बार दोहराया जाता, दौलत की खातिर..कुल मिलाकर महोब्त का मुल्क दौलत के देश बन गया है।


कभी इस देश की पहचान ताज महल और अजंता की गुफओं से थी, आज बीएसई और एनएससी से उसका दर्पण देखा जाता है। सोनी महिंवाल अब प्यार में डूबते नहीं, डूबे तो भी कैसे , नदियों में कचरा, पानी से ज्यादा है, इतना की आप कचरे के पुल से पैदल ही दरिया पार कर जाये। फिर गांगा और जमुना के मिलन में मुहब्बत कैसे आएगी। हीर-रांझा की लव-स्टोरी के सट के लिये हमारी सरकार ने जंगल छोड़े ही नहीं, अगर कहीं कुछ जगंल बचे भी हैं तो वहां वो प्यार करने वाले नक्सली गोली या खाप-पंचायतो की लाठी की भेंट चढ़ जाते हैं।


खुदाई ने निकल कर खुद की बात ही करु तो ऐसा नहीं है, कि मेरे किसी से प्यार किया नहीं या किसी को मुझे प्यार हुआ नहीं..। एक तरफा से लेकर दोनो तरफ की मुहब्बत भी देखी, लेकिन किसी दोस्त ने सच कहा था कि, कुछ लोग रिश्ते बना नहीं पाते और कुछ निभा नहीं पाते.। गलती किसी थी, कहां हुई भूल इसके बारे की फिर कभी बतियाएंगे, इस दफा तो बात महोब्त और दौलत जंग की है भारत बदल रहा है, सोच से तेज और हम दौड़ रहे है मन की रफ्तार से। कल किसी दोस्त के साथ रात के खाने पर गया था। बेचारी चाहती नहीं पर घर पर शादी की बात चल रही है। ऐसा नहीं है कि उसे किसी से प्यार है पर लड़को को रिजेक्ट कर देती है। आखिर क्यों..? तो जवाब था कि उन किस्म के लड़कों से शादी करके छोटे सहर की सैर करनी होगी और मैडम को बड़े शहर की शौहरत की आदत है।


मैने उसे कहा कि कितना अच्छा होता है वो छोटा शहर, जहां आप पूरे परिवार के साथ रात का खाना खा सकते हो, अखबार पढ़ने का वक्त मिलता है और फुर्सत के कुछ पल..। ठीक उसी तर्ज पर जैसे गोरे भारत आकर झोपड़ियो की फोटा उतारते है और कसीदें पड़ है..। लेकिन मै तो ठहरा ठेक देसी, सो रात को खुद से पूछो कि क्या मै ऐसे छोटे शहर की सवारी करना चाहुगां। जो जवाब मिला नहीं.., मुझे तो पांच दिनों में हिमालय कि वादियां भी काटने लगती है। दिल्ली के शोर की आदत तो पढ़ गई। तेज रफ्तार जिंदगी, मां की बातें कम और एफएम की बक्वास ज्यादा सुनने की..। पैसे नहीं पावर ही सही पर चाहिये तो बहुत कुछ..। शायद यहीं हाल आज के प्यार का है वो पहला, दूसरा या तीसरा नहीं होता, प्यार तो महज़ प्यार होता हैं। जो फेसबुक-आर्कुट या टि्वीट करने से शुरु होता है, वैब-कैम से परवान चढ़ता है फिर नेट की नौटंकी की तरह जल्दी ही उसका सरवर-डाउन हो जाता है। फिर नया कनेंक्शन लो और लगे रहो इंडिया...।।


फाइव-डे, ODI और 20-20 खेल की पींग पर प्यार भी बदल रहा है, कभी शादी सात जनम का संबध थी, फिर Life partner की बाते होने लगी, उसके बाद Living कल्चर का दौर आया और अब तो One Night stand का जमाना है। उसमें में कुछ सज्जन बोर हो जये और Copal shuffling trend भी आजमाया जाता सकता है। उसके लिये भी एक खेल है जो दिल्ली-मुंबई के पॉश ईलाको में खेल जा है। पार्टी के बाद लड़के अपनी गाड़ियों की चाबियां एक बाउल में डालते है, लड़ियां अपनी आखों में पट्टी बांधती है। फिर जिसके हाथ जिसकी चाबी लगी, वहीं रात का साथी। कुल मिलताकर अब जीवन रफ्ता-रफ्ता नहीं रफ्तरा से जलता है..।


कुछ संस्कृति के ठेकेदार इसे पश्चिम की बुराई बताते है। उन्हे फ्रेंडशिप डे और वेलनटाइन डे तो नज़र आता है पर अंजता की गुफाये नहीं दिखती, गुप्त काल की कामासुत्र भी नहीं, देवदासी और कालीबड़ी की वैश्याओ की माटी से बनी काली मां मुर्त भी नज़र नहीं आती। फिर कुछ हिन्दु बाबाओं की बाते भी याद आत है कि ये इस्लामी-नापाक हरकत है, जहां चाचा-मामा की लड़कियों से शादी हो जाती है। तो उन्हें भी रामयाण का वो पाठ पड़ना चाहिये जिसमें लक्षमण सीता भाभी को मां का रुप दर्शाते थे और आज के हिन्दु परिवारों में बड़े भाई मौत के बाद देवर का पल्ला उड़ा दिया जाता है। फिर उसी भाभी मां से उसके देवर के बच्चे पैदा होते है।


Copal shuffling और कथित संस्कृति में समानता क्या है ? तो जवाब मिलेगा पूंजी या दौलत। पहले कैस में अमीर युवा लोग दौलत और दारु के नशे में सोये हैं और दूसरे में हमारे सांस्कृतिक ठेकेदार स्त्री को परिवार की सम्पति मानकर खोये हैं। सरल अल्फाजों में औरत घर का माल है, जो घर पर ही रहना चाहिये, चाहे बड़े बेटे का पल्लू बांधकर या छोटे का सहांग बनकर। कुछ यहीं हाल है समाज के प्यार का भी है, जहां यूपी और बिहार में ठाकुर और भूमिहार, वहीं राजस्थान और हरियाणा में राजपूत और जाट पिछड़ो को अपना पानी नहीं देते तो प्यार की क्या बात करें। समाज से निकल कल ठेठ भारतीय शादी की बात करें तो प्राय पति, पत्नि की चाहत को ताक पर रखकर सेक्स करते है। फिर चाहे कैसी भी हालत और कोई भी दिन हो और बेचारी स्त्री अपने इस ताथाकथित रेप की शिकायत ना कानून से कर सकती है या समाज से..। आखिर समाज की जगह सोशल-साइट लेने लगी है। वैब-कैम पर बच्चे पैदा नहीं हो सकते वरना अल्ला जाने राम..।


कहते है जब बुद्धी से जवाब ना मिले तो बच्पन में लौट चलो, आखिर बच्चे मन के सच्चे..। मै भी मुनसीपार्टी के स्कूल में कच्ची पहली कक्षा में बैठक देखता हु। बच्चे पहाड़े दोहरा रहा है। “दो एकम दो, दो दुनी चार “ इससे एक बात का ख्याल आया कि, इतिहास भी तो खुद को दोहता है। जब दौलत की भूख से पेट में दर्द होने लगेगा है तो प्यार की प्यास जागे जायेगी।


भारत दुनियां की सबसे बड़ी आर्थिक शाक्तियों में एक है, जल्दी ही सोने की चड़िया फिर से बन जाएगा। तब जाकर सेक्स और सेंसेक्स से दूर कहीं सवेरा होगा। मुहब्बत रगं लाएगी। मां की ममता और जीवन साथी के प्यार के मोल को हम लोग दौलत से नहीं तोलेंगें। तब सोनो तो बहुत होगा पर सच्चा साथी नहीं..। आज भी इस सच्चाई की समझ हमे आने लगी है। एक घन्टे सैल और नेट बंद हो जाऐ तो एहसास होता की दुनियां में भीड़ है पर हम लोग कितने अकेले है..। खुदा से दुआ करुगा को महोब्त की महक से गांग-जमना छलक उठे और फिर से हम भारत के लोग प्यार की धरती का वहीं गाती गुनगुनाएं... है प्रीत यहां की रीत सदा।

शुक्रवार, मई 14

जाति है की जाती नही...।।

2001 से 2010, बीते दस सोलों में देश कई गुना आगे निकल गया है। बाजार से रोजगार तक, गांव से शहर तक और दलितों से सवर्णो तक ने विकास का स्वाद चखा है। लेकिन हमारी जातियां पिछड़ रहीं है। आजादी के वक्त कुछ कम पिछड़ी थे, 1991 में ज्यादा पिछड गई और अब इनं पिछड़ो की गणना करना चाहती है सरकार। शायद अंग्रेजों के समय से आज तक राज वहीं सकता है जो बाटनें की नीति पर चलता हो, चाहे बात गोरो की हो या नेताओं की। धर्म से जाति तक, शहर से गांव तक, आदमी से औरत तक बटते बटते हम लोग, हम से मैं हो गये है..फिर ये गिनती क्या..?

गिनतियां क्या - क्या गुल खिला सकती हैं , यह पंजाब के मामले में जनगणना के भाषाई पहलुओं की रोशनी में देखा जा सकता है। पंजाबी , जो हिंदुओं और सिखों की समान भाषा थी , तकनीकी रूप से सिर्फ सिखों की भाषा रह गई क्योंकि हिंदुओं ने राजनीतिक प्रभाव में आकर अपनी मातृभाषा हिंदी लिखाना मुनासिब समझा। विख्यात भारतविद् मार्क गैलेंटर का यह कथन एकदम सही है कि जातिगत सेंसस बेरोजगारी , शिक्षा और आर्थिक हैसियत से संबंधित सूचनाओं में भी गड़बड़ी पैदा करता। जो जाति खुद को जितना अशिक्षित , गरीब और बेरोजगार दिखाती , उसे राजनीतिक क्षेत्र में सरकार के संसाधनों पर उतनी ही बड़ी दावेदारी करने का मौका मिलता।

हर दस साल में होने वाली जनगणना के गले में एक बार फिर जाति अटक गई है। जनगणना में जाति को शामिल करने की मांग आज से दस साल पहले यानी 2001 में जनगणना शुरू होने के पहले भी उठी थी , पर तब इस मांग को बिना किसी दुविधा के खारिज कर दिया गया था और उस पर कोई खास राजनीतिक प्रतिक्रिया भी नहीं हुई थी। इस बार मामला कुछ अलग है।


सवाल यह है कि अपनी संख्या कौन जानना चाहता है ? केवल वही जिसे संख्या बल के आधार पर किसी तरह के फायदे की उम्मीद हो। भारतीय लोकतंत्र के संस्थापकों को यह अहसास था। इसलिए शुरू से ही उनकी नीति संख्या के महत्व को एक हद से ज्यादा न बढ़ने देने की थी। उन्होंने संख्याओं का इस्तेमाल किया , पर पारंपरिक पहचानों के सेक्युलरीकरण के लिए। 1939 के बाद भारत की जनगणनाओं में जाति का उल्लेख करना बंद कर दिया गया था। आजादी के बाद यह परंपरा बदले हुए परिप्रेक्ष्य में जारी रखी गई। चूंकि संविधान निर्माताओं ने पूर्व - अछूतों और आदिवासियों की विशेष स्थितियों के मद्देनजर उन्हें उनकी जनसंख्या के मुताबिक राजनीतिक आरक्षण देने का फैसला किया था , इसलिए जनगणना में केवल उनकी संख्या का जिक्र किया गया। संविधान पिछड़ी जातियों को राजनीतिक आरक्षण देने के पक्ष में नहीं था। वह उन्हें सिर्फ नौकरियों और स्कूल - कॉलेजों में आरक्षण देना चाहता था। उसके लिए गिनती की बजाय शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन को आधार बनाना ही काफी था। इसलिए पिछड़ी जातियों को जनगणना में शामिल करने की जरूरत नहीं समझी गई।

आरक्षण , जाति और जनगणना के इस व्यावहारिक त्रिकोण को अपनाने के पीछे जो दूरंदेशी थी , उसकी कामयाबी आज आसानी से देखी जा सकती है। इस सफलता के तीन पहलू हैं : पहला , सरकारी लाभों को बांटने के मकसद से इसके आधार पर जातियों की पारंपरिक पहचान अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी सेक्युलर श्रेणियों में बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। दूसरा , पिछड़ी जातियों ने चुनावी राजनीति के माध्यम से अपने संख्या बल को आधार बना कर आरक्षण प्राप्त किए बिना विधायिकाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल कर लिया। और , साथ में उन्हें नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में भी आरक्षण मिल गया। पिछड़ों को आगे बढ़ने के लिए न तब जरूरत थी और न अब अपनी गिनती जानने की जरूरत है। तीसरा , आरक्षण के दायरे में न आने वाली अगड़ी जातियां खुले दायरे में आधुनिक शिक्षा और बाजार के जरिए मिलने वाले अवसरों के माध्यम से सेक्युलरीकरण के दौर से गुजरीं। वे वैसे ही संख्या में बहुत कम हैं। इसलिए उन्हें अपनी संख्या जानने की उत्सुकता बहुत कम होती है।

यहां यह सवाल पूछना जायज है कि अगर जनगणना में हर नागरिक की जाति का जिक्र किया जाता , तो उसके क्या परिणाम निकलते ? उसका पहला नतीजा यह निकलता कि आजादी के बाद समाज में राजनीति और बाजार के जरिए सामाजिक ऊंच - नीच की भावना में अब तक जो कमी आई है , वह काम नहीं हो पाता। दूसरे , जिस परिघटना को अभी हम वोट बैंक कहते हैं , वह एक मोटी - मोटी अवधारणा ही है। दरअसल व्यावहारिक अर्थ में किसी जाति का वोट बैंक मौजूद नहीं है। चुनावी आंकड़े बताते हैं कि जातियों का वोट एक पार्टी को कुछ ज्यादा मिलता है , पर बाकी वोट विविध कारणों से बंट जाते हैं। इससे असल जमीन पर जातिगत समुदायों का कोई राष्ट्रीय एकीकरण नहीं हो पाता है और उनके सेक्युलरीकरण की व्यापक प्रक्रिया बिना धक्का खाए धीरे - धीरे ही सही , पर चलती रहती है। अगर सभी नागरिकों से जनगणना के दौरान उनकी जाति पूछी जाती तो हमारी राजनीति को असल में वोट बैंक का स्वाद पता चलता। तीसरे , गिनती से जुड़े हुए मौजूदा फायदों को उठाने के लिए तो लोग अपनी जातियों को बदल कर पेश तो करते ही , उनकी संख्या का अहसास ही उन्हें फायदों की राजनीति करने के लिए उकसाता। आज उनके पास निश्चित संख्याएं नहीं है , इसलिए ऐसी कई मांगों को नजरअंदाज किया जा सकता है। मसलन , महिला आरक्षण विधेयक में पिछड़ी जातियों का कोटा शामिल करने की मांग को ठुकराना तब नामुमकिन हो जाता और संविधान की भावना का उल्लंघन करते हुए स्त्रियों के नाम पर पिछड़ी जातियों द्वारा राजनीतिक आरक्षण हड़पने की संभावना बढ़ जाती। आज के जमाने में जातिगत सेंसस की प्रासंगिकता और भी कमजोर हो गई है। व्यक्तियों और समुदायों का आर्थिक विकास अब सरकारी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा , बल्कि इसमें प्राइवेट सेक्टर और बाजार की भूमिका ज्यादा है। बाजार एक सीमा तक ही अफरमेटिव ऐक्शन को अपना सकता है।

प्राइवेट और पब्लिक से दूर, दर्द तो इस बात का है कि हमारी सरकार ने भी गोरो की चाल अपना ली..बाटों और राज करों। वो भी राजा की तरह नेता की नहीं..। जाति के नाम पर प्यार करने वालो को सूली पर चढ़ा दिया जाता हैं, जनता को जला दिया जाता, जन्म से भेदवाद किया जाता, आरक्षण पर हिंसा होती है, और उसे जायज़ दिखानें के लिये जनगणना..। पर पापा ने तो बचपन में कहा था कि जाति जोड़ने का काम करती है, शायद जन की इस गणना का गणित मेरी समझ में नहीं आया..। पापा की बात ही नहीं...गांधी के हरिजन, टैगोर के आंनद, अम्बेडकर के दलित, मनु के मानव और जाति की जनगणना को भी, मै जानं नहीं पाया..। इंन सबसे बढ़कर हम लोग सोच भी मेरी समझ में नहीं आती, जो खुद को पिछड़ा साबित करने के लिये अगड़े होकर मरने-मारने सदैव तैयार है, मेने दुनियां में ऐसा कभी-कहीं नहीं देखा....आपक पता हो तो कृपया बता दें ….?