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सोमवार, दिसंबर 22

दहक रहे है युवा

दहक रहे है युवा


वो दौर बीत गया जब हमारा सपना था अधेड़ उम्र की दहलीज पर अपनी कार की सवारी और रिटायरमैंट के पैसे से अपने घर खरीदना, आज युवाओं में पैशेंस नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। अजस्ट करते-करते हम 125 करोड़ के पार पहुंच गए, अब मेट्रो से बस की सीट के लिए एजस्ट ही तो कर रहे है । अब सहना मान है और साहस जरुरी । हमारी सौच में वर्क-हार्ड और पार्टी-हार्डर का कॉसेप्ट रहता है, हमें क्रेडिट कार्ड पर खुशियां खरीदें की आदत है। हम 18 घंटे काम को तैयार है बशर्ते महीनें के अंत में सैलरी 6 अंको में मिले । हम जितनी मेहनत खुद करते है उतनी ही सरकार से भी चाहते है, तभी 12 घंटे काम करने वाला सीएम चाहिए और 15 घंटे काम करने वाला पीएम । दहकते है चैंज से लिए, पुरानी पीढ़ी से हमें आजादी विरासत में मिली लेकिन आजादी की उड़ान हमे विकास से भरनी है। अब अमेरिका नहीं जा सकते है पर अपने देश को को वेस्ट से बेस्ट बना सकते है । यह बात हमारी सोच में नज़र आती और सपनों में भी...


ऐसा भी नहीं है कि, हम पुरानी पीढ़ी से सरोकार नहीं रखते, बस शर्त केवल इतनी है कि, उन बुजुर्गों की सोच में भी युवा जोश होना चाहिए , जब अन्ना ने कहा वो नेता नौकर है नौकर और हम जनता मालिक हैहम युवा देहके और फेसबुक की वर्चुअल दुनियां छोड़ रामलीला मैदान से भ्रष्टाचार के खिलाफ महाभारत का ऐलान कर दिया । ऐसा भी नहीं की हमारे जोश को किसी नेता की हर दम जरुरत हो, 16 दिसम्बर को दामिनी की अस्मत पर हमला हुआ और हम अपनी उस बहन के वीरा (भाई) बन विजय-चौक पर पहुंच गए, सत्ता के ठेकेदारों को अपने जूते की ठोकर की धमक दिखाई, इंडियां गेट पर लाठी खाई लेकिन ख़ाख़ी और ख़ादी को इसकदर मजबूर कर दिया कि उन्हे संसद की चौपाल से नारी के सम्मान का बिल पास करना पड़ा ।


हमें अब नेताओ के वादे नहीं इरादें चाहिए , पांच साल तक इंतजार करना हमारी फितरत में शुमार नहीं । जब-जिस पल लगा की सरकार खुद को खुदा समझ रही है, जनपथ पर उतरकर राजपथ जाम कर देगें..। हमारी आवाज़ चैनलों और अख़बारों की मौहताज़ भी नहीं, फेसबुक-टयूटर-यू-टियूब से ही अब रक्तहीन क्रांति का आगाज़ करने की ताकत रखते है। 377 को नहीं मानते, लिव-इन के लिए शादी की शर्त भी मंजूर नहीं, हमने बाबरी पर बावरा होना छोड़ दिया है, हमें मंदिर नहीं मेहनत पर भरोसा है, विकास की भूख है और हमे इंतज़ार का अचार पंसद तक नहीं ।

हमारी दहती सोच के निशाने पर सरकार और सियासत ही नहीं पुरातन समाज और सस्कांर भी है जो स्कूली बच्चियों को सर्कट पेहनें से रोकते है और हमे लगता है 10 बरस की बच्ची की सर्कट से छोटी उनकी सोच है जो उस कन्या में भी वासना का वास देख लेते है। संसद और विधानसभाओं में तो नेता सिर्फ जाति-धर्म की ज़ज़ीर तोड़ने का भाषण देते है पर हम तो लव-मैरिज़ से वर्ग औऱ वर्ण के बंधन तोड़कर जीनें का मंत्र जानते हैं । वो लोग तो आज भी खाने में नोर्थ और साउथ इंडियन की सोच रखते है पर हमे को कॉटीनेंटल पंसद है, ग्लोबल हमारी समझ है और बटावा हमें भाता नहीं ।


जड़ो से प्यार हमें भी है, लेकिन जड़ो में जकड़े जाना मुनासिब नहीं लगता, 15 अगस्त पर अग्रेज़ों के अत्याचार की कहानी बार-बार सुनना हमे बोरिगं लगता है, करेप्शन की कांट लाल-किले के प्राचीर से बताओं तो जानें...। हाथ जोड़ना हमारे संस्कार में है पर हमेशा जुड़े रहे यह जरूरी नहीं , हमे सपनों का भारत नहीं बल्कि सचाई का भारत चाहिए । आरटीआई, आरटीई, फूड-सिक्रोरिटी उनकी भीख नहीं हमारी भूख की वजह से मिला वरना जिन नौकरशाहों को एक सरकारी फाइल पर साइन करने में परेशानी होती है वो सिटीजन-चार्टर के तहत अपनी मर्जी से काम करने लगे यह तो संता-बंता से बड़ा जोक होगा । कुछ लोग कहते है कि युवा जोश हमेऱशा ठोकर का शिकार होता है लेकिन गिरता वहीं है जो दौड़ता है और हमें खड़े-खड़े पाषाण बन जाते है ठोकर खाती नदीं बनता बेहतर लगता है । हमने पड़ोसी पाकिस्तान औऱ श्रीलंका से तुलना करना छोड़ दिया है हमे  चीनी ड्रेगन सी रफ्तार चाहिए और अमेरिकी अंकल सेम सी अरीमी भी ..और हम इसे सिर्फ कहकर नहीं छीनकर लेगें...।
                                            


शुक्रवार, दिसंबर 3

बलात्कार - सेक्स और समाज का चश्मा

आज सुबह की बात हैं मेट्रो से दफ्तर का सफर तभी किसी दोस्त का फोन आया बोली मैं बहुत खुश हूं आज के दिन पर.. मैनें सोचा आज तो भोपाल गैस कांड की बरसी है तो आज के दिन खुश होने वाली भला क्या बात? फिर वो बोली अख़बार पढ़कर खुश हुई, उसमें धौलाकुआं रेप के केस के दो आरोपियों की गिरफ्तारी की ख़बर छपी थी। वो बोली “चलो कम से कम पुलिस के हत्थे तो चढ़े..लेकिन अगर रेप होता ही नहीं सुरक्षा इतनी पुख्ता होती तो अच्छा रहता।“ मैनें कहा “ बेहतर होता कि बलात्कार पीड़ित लड़कियों को समाज स्वीकार ले ” उसने कहा कि exceptions से रेप होने बंद हो जाएंगे, मेरा जवाब था नहीं लेकिन परिवर्तन जरुर आएगा। हरियाणा में सबसे ज्यादा भ्रूण हत्या क्यों होती हैं ? क्योंकि वहीं रोटी-बेटी का रिश्ता सबसे व्यापक है, दहेज बहुत चलता हैं। जब बेटी होना महंगा और घाटे का सौदा है तो भला कौन मोल ले इस मुसीबत को !! जवाब सीधा सा है अगर दहेज रुकेगा तो लड़ियां भड़ेगी..फिर चाहे उसके बदले हुड्डा अपने चुनावी मैनेफ्सटो में लिखवाये कि हरियाणा में किसी को कुंवारा नहीं रहने देंगे या शीला लाडली सी योनजा चलाए कुछ नहीं बदलने वाला...।

वो बोली दहेज से रेप का क्या रिश्ता, मैनें जवाब दिया कि देख रेप एक Sexual-Physical मुद्दा है और दहेज-भ्रूण हत्या एक Socio-economical ममला पर दोनों में स्त्री समान है और सामान भी...। दहेज़ रोकने के बेटियों की बलि रुकेगी और रेप पीड़ित लड़कियों को दिल और समाज (शादी) अपनाने से दर्द कम होगा। ठीक वैसे ही जैसे जब हमें बुखार होता है, तो हम चाहते हैं कि घरवाले हमारी केयर करें और अगर किसी लड़की का रेप हो तो उसे भी लाइफ में उस वक्त सबसे ज्यादा जरुरत अपने पति-पिता या प्यार की ही होगी..क्योकि इसमें उसका कोई कसूर नहीं था, जो उसे मौत सा दर्द सहना पड़ा कम से कम पुरुष उसके दर्द पर दवा का काम तो कर सकते है नमक की जगह...।

मेरी दोस्त बोली कि ऐसा तो exceptional नहीं मुनिंग है, मेरा जवाब था – “आज हम दोनों लव-मैरिज़ करने जा रहे हैं, 100 साल पहले ये मुनिंग नहीं था। उससे 100 साल पहले विधवा-विवाह सम्भव नहीं था, लेकिन राममोहन राय ने करके दिखाया। और आज लड़के के मर जाने पर उसके मां-बाप ही अपनी बहु की शादी की वकालत आमतौर पर रहते हैं। दोस्त ये कोई रुसी क्रातिं नहीं है, जो पल भर में हो जाये और क्षण भर में बर्लिन की दीवार की तर्ज पर ढह जायें..परिवर्तन एक दिन में नहीं होता लेकिन सदा के लिये होता हैं।“ मेने एक नॉवल पढ़ा। कारगिल के किसी अफसर का, जिसमें 99 की जंग में देश के लिये वो अपाहिज हो गया था। अपनी पत्नी को सेक्सव्ल खुशी नहीं दे सकता था। उसने अपनी पत्नी के लिये जिगोलो (मेल-कॉल बॉय) बुलाना शुरु किया आज वो दोनो (पति-पत्नी) साथ है और खुश भी...ये प्यार है और परिवर्तन भी..। जो रेप के बाद अपनाने से किसी भी तरह कमतर नहीं ।

यहां सवाल सिर्फ धौलाकुआं रेप केस तक सीमित नहीं है। हर रेप के बाद ऐसे लोगो की कमी नहीं होती जो कभी वक्त और कभी वस्त्रो को बहाना बनाकर लड़की के क्रकट्रर पर सवाल खड़े करते रहते हैं। लेकिन रेप भी दो किस्म के होते है गैरकानूनी रेप और कानूनी या सामाजिक रेप। मेरी एक बंगाली दोस्त थी आर्कुट-फ्रेंट उसने बताया था कि, बच्चपन में उसके मामा उसके साथ रेप करते थे। लेकिन वो कुछ बोल नहीं पाती..आज भी उसे हर लड़के से डर लगता हैं, मानो वो यमदूत हो..। मेरे बहुत समझाने पर वो एक लड़के से शादी के लिये राज़ी हो गई..लेकिन शादी के बाद वो कभी खुल कर जी पाई होगी या नहीं मै नहीं जानता...। यह फैमेनिस्टा के लिये मुद्दा हो सकता है लेकिन समाज के लिये सवालह हैं कि मामा से लेकर पति के भाईयों तक इसे कहते हैं Social rape। मेरी कुछ दोस्त ऐसी भी है जिनके साथ Legal Rape होता है..यानी जब periods या pregnancy में उनका पति बिना रज़ामंदी के सैक्स करता हैं। और वो चिल्लाकर, रोकर, मरकर सो जाती हैं, अगर दिन का दर्द सहने के लिये..।

एक लड़की थी, किसी जमानें में मेरे सबसे करीब, उसकी जाति या मज़हब बनाना नहीं जरुरी वरना पाढक उसमें भी वज़ह डूंडनें लगेगें। उसका बच्चपन छोटे परिवार में गुज़रा था, जवानी की दहलीज पर किसी कारण जौवांइट फैमली में जाना पड़ा। वो बताती थी कि उसके संयुक्त परिवार में जब लड़कियां 14-15 साल ही होती है, उनके कज़न (चचेरे-भाई) कई बार उन्हें पीछे से आकर पकड़ लेते थे। अगर विरोध किया तो बोलते “ बहन डर गई, बहन डर गई” और अगर नहीं किया तो बहुन......द बन गये..। ये किसी भी लड़के या लड़की की वो उमर होती है, जब सेक्स की फीलिगं अपने शबाब पर होती हैं जब परिवार चोखट से बाहर ना जाने दें भाई-दूज से कुछ और भी बन जाता हैं। जब मेनें पहले-पहल ये बात उसके मुह से सुनी तो आखों से आसु निकल पड़े...। मेरे उसे कहा कि कभी तुमनें ऐसी बात मम्मी को नहीं बताई..वो बाली एक बार उसके अपने भाई और एक कज़न को सेक्स करते देख लिया था। दोनो गै वाले काम कर रहे थे..रोती-रोती मम्मी के पास गई, सारी बात बताई..मम्मी बोली अनदेखा करे दो...।“ ये कहकर उसकी आखें छलक गई..मेनें उसे लगें से लगाया, क्योकि उस वक्त उससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं करता था..पढ़ रहा था, नौकरी नहीं थी..अगर होती तो यकीन्न उसी समय उससे शादी कर लेता और उस घर लौटनें नहीं देता। यह था Social Rape, जब IPC377 हुआ करती थी। गै होना कानूनी अपराध था लेकिन परिवार पापी हो जायें तो पार्थना भला किसेसे कीजिऐंगा..। जो एक परिवारिक इज्जत का दरीचा बनाकर, उस गलीचे के नीचें औरत का सम्मान की समाधी लगा देते हैं..।

लड़कियों की आप बीती हो बहुत पढ़ ली अब एक लड़के का किस्सा भी सुन लीजियें..राजौरी का रहीस, गाड़ी-बंगले में बसर करनेवाला..। हम लड़को के सामनें हमेशा शैखी बखार्ता था, कि मैं जब चाहु अपनी किसी गर्ल-फ्रेंड के साथ सेक्स कर सकता हु..कभी-कभी तो दोनो लड़कियों के साथ एक साथ..। फिर एक दिन उसने इसका राज़ बताया।। बाला “ देखो यार जब आप किसी भी लड़की से स्मूच (लिप-किस) करते हैं तो उसकी आंखे बंद हो जाती है..उसी टाइम में अपने सैल-केमरे से MMS बना लेता हु..फिर तो जब चाहे जो मर्जी करों..एक के साथ या दोनो की मार लो..” । ऐसे लड़को की कमी नहीं है जो पहले तो लड़कियों का कस्में देते नहीं थकते फिर उसकी इज्ज़त पर थूक कर आगे भड़ जाते हैं..इसे करते है रज़ामंदी से रेप...। जब लव-यू, किस-यू कहें तो आप और मना करना तो बाप..कि मेरा परिवार नहीं मानेगां और मैं अपने परिवार का साथ नहीं छोड़ सकता..। लड़की अकेली..ठगीं सी..बेबस..क्योकि ये रेप धोलाकुआं पर किसी अंजान ने नहीं उसके प्यार ने किया था..।

देखियें, बलात्कार - सैक्स और समाज का चश्मा जवाब मेरें पहले कथन में ही छीपा है कि ये एक Sexual-Physical मामला हैं। क्योकि एस ताकतवर हमेशा कमजौर को दबाता आया है चाहे मुद्दा मुल्क का हो या मनुष्य का..। Physically हो सकता है कि एक लड़की मार्शल-आर्ट सीखकर दस लड़को को मजा-चखा सके लेकिन दसों लड़िया एक नहीं हो सकती..। Sexual इसलिये कि अगर आमतौर पर लड़किया ज्यादा बलशाली होती हो बलात्कार लड़को का ही होता..। अगर आपको मेरे बातों पर भरोसा नहीं तो मेरे पुरुष-पाठक कभी देर-रात दिल्ली के किसी पांचसितारा होलट, राजपथ, पंडारा रोड़, सीपी या अशोक मार्ग पर ठीक-ठाक कपड़े पहनकर खड़े होकर देखें..। कम से कम दस आलिशान कार को आपने रास्ते पर आकर खड़ी हो ही जाएगीं..। जिसमें से 30-40 उमर की औरतें निकल-कर आपको पैसा ओफर करेगीं..एक रात के 15000 तक मिल सकते हैं। यानीं Sexual मुद्दा पर कोई मतभेद नहीं चाहें मामला जेपी-रोड़ का हो या पंडारा-रोड़ का लड़के और लड़ियां दोनो समान है और सामान भी..खरीदार चाहियें..।

आपके मन मैं दो सवाल उठ करे होगें पहले पंडारा-रोड़ का रहस्य मैं कैसे जानता हु..क्या मै भी जीगोलो को नहीं तो साहब पैशे के पत्रकार होने की वजह से रात भर मीडियां की मंडी और सेक्स का बाजार चलता रहता है और दुसरा सवार बलात्करा पर बहस और ब्लॉग लिखना बहुत आसान होता है..अगर खुद की पत्नी या प्यार के साथ हो तो अक्सर जनाब के पास जबाव नहीं रहता..तो जान लीजियें मेरा जवाब हैं हा..साथ-संबध और शादी भी..डंके की चोट पर..अंतिम सांस तक क्योकि परिवर्तन हमारे बस में हैं....!!!