मै पहले ही आपको बता दूं, जो एतिहासिक थ्योरी मैं रखने जा रहा हूं..उससे मै भी पूरी तरह सहमत नहीं हूं और न ही वो परिपूर्ण है। किसी जाति का उत्थान कैसे होता है ? ये सवाल भारतीय समाजशास्त्र में गूढ़ रहस्य है। सविंधान सभा के कुछ सदस्यों को इसका जबाव बिट्रिश-लोकतंत्र की देन - आरक्षण में नज़र आया..हालांकि कुछ जानकार आरक्षण को महज बिट्रिश या पश्चिम की देन नहीं मानते..जब मुनस्मत्रि को पढ़ने का हक केवल सवर्णों और खासतौर पर पंडितो को दिया गया था, वहीं अगर कोई स्त्री या शूद्र इसे देख या सुन भी ले तो उसके उपर अनेक दंड दिए जाने के विधान थे, वो भी एक तरह का आरक्षित विधान ही था। जैसे हिन्दु इतिहास में परशुराम से पहले राज अधिकार महज क्षत्रियों को था..बाद में मौर्य (मयूर पालक), फिर गुप्त (गुप्ता) भी राज के ताज से नवाज़े गए।
लेकिन सवाल जस का तस है, कि कैसे किसी जाति का उत्थान सम्भव होता है। इसके लिये कुछ तथ्यों को भी लिया जा सकता है। जैसे गुप्त काल (350ई) तक राजपूतों (ठाकुर) को उदंड लड़ाके माना जाता था, उस दौर में वो हूर्ण कहलाये। लेकिन 606ई में राजा हर्षवर्धन के पतन के बाद राजपूतों से साथ भी राजवंश जुड़ने लगा..चौहान, पाल आदि। जब पहले-पहल अरबी हमलावर (मुस्लिम) ने भारत का रुख किया तो उसका सामना राजपूतानी तलवारों से हुआ। उस वक्त जाटों (चौधरी) को आदिवासी जाति माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कुछ सौ साल पहले राजपूतों के लिये कहा गया था। एतिहासिक शाक्षय है, कि जब मुहम्मद गजनवी का लश्कर लौट रहा था.. तो जाट कबीलों से उन पर पीछे से हमला किया..हालांकि उसमें जाटों को मुंह की खानी पड़ी..लूट की कीमत उनकी औरतों तक को चुकानी पड़ी।
वक्त कभी एक सा नहीं रहता.मुगलो के उत्थान में जिस तरह पृथ्वीराज, राणा सांघा और महाराणाप्रताप की कहानियां किस्से बन चुकी थी..तब तक राजपूतों के सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाने लगा था..वैसे ही मुगलों के पतन के करीब मर्द-मराठा (शिवाजी), चंद्रवशीं-जाट (सूर्जमल) और खालसा-जटसिख (रंजीतसिहं) के राज्यों और करनामों ने भी इन जातियों को भी क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग बना दिया। इन्हें ब्रिटिश आर्मी में भी मार्शल रेंज माना गया।
1857 के पहले हुई आदिवासी क्रांतियों से गुर्जर लुटरे से वीर कहलाने लगे, खुद को वासुदेव कृष्ण के जोड़कर अहिर (यादव) की यदुवंशी क्षत्रिय मानने लगे..लेकिन राज ना होने की वजह से गुर्जरों और यादवों को, ठाकुर (राजपूत)- चौधरी (जाट) का सम्मान नहीं मिल पाया।
1947 में मुल्क-बंटा, नया वोटबैंक भी बना सो जातिगत सियासत ने उन्हें सम्मान दिलाने की कोशिश भी की..मैने अपने जीवनकाल में देखा, कि जब मुलायम सिंह यादव सूबे के वजीर (उत्तर-प्रदेश) बने तो उनकी सुरक्षा में लगा कोई भी जवान अहिर नहीं था। यादव (राव-साहब) ने फिर एक मुहिम चलाई और यूपी पुलिस में यादवों का आकड़ा बढ़ने लगा, कुछ लोग उसे यूपी-पुलिस में हुई भर्तियों के घोटाले से भी जोड़ते हैं। बिहार में लालू जी की सत्ता-स्थापित हुई तो..तथाकथित भूमिहार कहा - अब गाय चराने वाले लल्लू भी सूबे की सरकार संभालेंगे...। लेकिन दोनों यादवों ने यादव जाति को राज और राजनीति में स्थान दिला दिया। आज यादव भले ही ओबीसी का अंग हो, लेकिन किसी भी तर्क (आर्थिक-सामाजिक) पर पिछड़े नहीं कहलाये जा सकते हैं।
अब बात करें गांधी के हरिजनों की या बाबा के दलितों की..बाबासाहब और बहजनी को छोड़कर कोई बड़ा उलटफेर करने वाली शख्सियत इनके लिये नहीं रही। हालांकि राममोहन राय, गांधी जैसे अगड़ो-पिछड़ो के उत्थान का बीड़ा उठाया या फिर साहूजी मानंद्य कुछ समाजसुधार कार्य हुई। लेकिन बड़ा उलटफेर पूना-पैक्ट (1942) के वक्त देखने में आया। जब देश के सबसे बड़े नेता गांधी के समकक्ष अम्बेडकर ने बैठक की..और जातिगत आरक्षण की नींव भी कहीं ना कहीं उसी से पड़ी। फिर मायावती ने अपने गहनों-सियासी सोच (मनुवाद से मानववाद) और प्रशासनिक शक्ति से, ये जता दिया कि पैसा, बुद्धी और शौर्य किसी खास जाति की जागीर नहीं है।
हालांकि कुछ सियाने इसमें में कमियां निकाल लेते है, कि दलित होने की वजह से व्यक्तित्व मजबूत नहीं होता। जिस तर्ज पर सुभाष-भगत सिहं ने गांधी की आंधी के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ी थी। वो मादा बाबासाहब में नहीं था, वो तो धर्म की जंग भी हार गये और मरने से पहले हिन्दू धर्म को त्याग कर बुद्धं धर्मं गच्छामि बन गये थे। जिस जोश के साथ जेपी, चरणसिंह कांग्रेस राज के खिलाफ खड़े हुये थे वो ताकत बहनजी की बसपा ने कभी नहीं दिखाई, वो तो बीजेपी, सपा और कांग्रेसी समेत सभी घाट का पानी पी चुकी हैं। लेकिन जन्नत की हकीकत तो यही है कि, इन दोनों के अपनी जाति का जलवा पहले-पहल भारतीय लोकतंत्र में दर्ज जरुर करवा ही दिया। आज पंजाब-हरियाणा में दलित-गुरुओं के डेरो का डंका है। रोटी-बेटी का रिश्ता चाहें अभी दूर की कौड़ी हो लेकिन छुआछूत का कलंक मिट चुका हैं।
जो जातियां खुद को अगड़ी मानती है, वो भी आरक्षण की हड्डी के आगे, अपनी लालची लार टपकाये, दुम हिलाती दिखाई देती है..उसका उत्थान भी राज्य से हुआ था और दलितो का भी राजनीति से हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे नंदवंश ने पालि, मौर्य ने प्राकृत, गुप्त ने संस्कृति, खिलजी-तुगलक ने अरबी, मुगलों से खारसी और कांग्रेस ने हिन्दी को बढ़ावा देकर राज-भाषा बना दिया। लेकिन क्या इस जातिगत अवतार का रास्ता आरक्षण की नीति से तय होगा क्योंकि विश्व इतिहास साक्षी है कि सोवियतसंघ में जिन मजदूरो-किनासो की CPSU से बुरजवा कार्ति की नींव रखी थी..बाद में वहीं अभिजात वर्ग बन गये और रुसी विभाजन का कारण बने। आरक्षण भी एक जाति में एक अभिजात वर्ग का रचयिता है। कैसे रामविसाल के बेटे को आरक्षण किया जा सका है? कैसे दलितो पर जुल्म करने वाले, अमीर किसान जात OBC हो सकते हैं? क्योंकि पढ़ा लिखा मुस्लमान कहता है कि काश वो हिन्दू होता और पिछड़ा हिन्दू होता?
इन सावलो के जवाब मेरे पास नहीं है, ऐसा नहीं है की मेने इसका जवाब खोजने की कोशिश नहीं की Y4E और आरक्षण विरोधी मुहिम, समान भारत की जंग में मैं भी लड़ा था, लेकिन जाति का जंजाल बहुत-बलवान हैं। ये सवर्णों में (बाहमण-क्षत्रिय) में लड़ाई करवा जाता है, दलितो में (अभिजात और पिछड़े) में बंटवारा कर जाता है। जाति है कि जाती नहीं..ना रोटी से ना बेटी से..ना लोकतंत्र से ना भीड़तंत्र से..ना लव-मेरिजों से ना इंटरनेट से...। इसका जवाब मेरे पास नहीं, आपके पास हो प्लीज बता दें..जाति क्यो नहीं जाती ???
लेकिन सवाल जस का तस है, कि कैसे किसी जाति का उत्थान सम्भव होता है। इसके लिये कुछ तथ्यों को भी लिया जा सकता है। जैसे गुप्त काल (350ई) तक राजपूतों (ठाकुर) को उदंड लड़ाके माना जाता था, उस दौर में वो हूर्ण कहलाये। लेकिन 606ई में राजा हर्षवर्धन के पतन के बाद राजपूतों से साथ भी राजवंश जुड़ने लगा..चौहान, पाल आदि। जब पहले-पहल अरबी हमलावर (मुस्लिम) ने भारत का रुख किया तो उसका सामना राजपूतानी तलवारों से हुआ। उस वक्त जाटों (चौधरी) को आदिवासी जाति माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कुछ सौ साल पहले राजपूतों के लिये कहा गया था। एतिहासिक शाक्षय है, कि जब मुहम्मद गजनवी का लश्कर लौट रहा था.. तो जाट कबीलों से उन पर पीछे से हमला किया..हालांकि उसमें जाटों को मुंह की खानी पड़ी..लूट की कीमत उनकी औरतों तक को चुकानी पड़ी।
वक्त कभी एक सा नहीं रहता.मुगलो के उत्थान में जिस तरह पृथ्वीराज, राणा सांघा और महाराणाप्रताप की कहानियां किस्से बन चुकी थी..तब तक राजपूतों के सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाने लगा था..वैसे ही मुगलों के पतन के करीब मर्द-मराठा (शिवाजी), चंद्रवशीं-जाट (सूर्जमल) और खालसा-जटसिख (रंजीतसिहं) के राज्यों और करनामों ने भी इन जातियों को भी क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग बना दिया। इन्हें ब्रिटिश आर्मी में भी मार्शल रेंज माना गया।
1857 के पहले हुई आदिवासी क्रांतियों से गुर्जर लुटरे से वीर कहलाने लगे, खुद को वासुदेव कृष्ण के जोड़कर अहिर (यादव) की यदुवंशी क्षत्रिय मानने लगे..लेकिन राज ना होने की वजह से गुर्जरों और यादवों को, ठाकुर (राजपूत)- चौधरी (जाट) का सम्मान नहीं मिल पाया।
1947 में मुल्क-बंटा, नया वोटबैंक भी बना सो जातिगत सियासत ने उन्हें सम्मान दिलाने की कोशिश भी की..मैने अपने जीवनकाल में देखा, कि जब मुलायम सिंह यादव सूबे के वजीर (उत्तर-प्रदेश) बने तो उनकी सुरक्षा में लगा कोई भी जवान अहिर नहीं था। यादव (राव-साहब) ने फिर एक मुहिम चलाई और यूपी पुलिस में यादवों का आकड़ा बढ़ने लगा, कुछ लोग उसे यूपी-पुलिस में हुई भर्तियों के घोटाले से भी जोड़ते हैं। बिहार में लालू जी की सत्ता-स्थापित हुई तो..तथाकथित भूमिहार कहा - अब गाय चराने वाले लल्लू भी सूबे की सरकार संभालेंगे...। लेकिन दोनों यादवों ने यादव जाति को राज और राजनीति में स्थान दिला दिया। आज यादव भले ही ओबीसी का अंग हो, लेकिन किसी भी तर्क (आर्थिक-सामाजिक) पर पिछड़े नहीं कहलाये जा सकते हैं।
अब बात करें गांधी के हरिजनों की या बाबा के दलितों की..बाबासाहब और बहजनी को छोड़कर कोई बड़ा उलटफेर करने वाली शख्सियत इनके लिये नहीं रही। हालांकि राममोहन राय, गांधी जैसे अगड़ो-पिछड़ो के उत्थान का बीड़ा उठाया या फिर साहूजी मानंद्य कुछ समाजसुधार कार्य हुई। लेकिन बड़ा उलटफेर पूना-पैक्ट (1942) के वक्त देखने में आया। जब देश के सबसे बड़े नेता गांधी के समकक्ष अम्बेडकर ने बैठक की..और जातिगत आरक्षण की नींव भी कहीं ना कहीं उसी से पड़ी। फिर मायावती ने अपने गहनों-सियासी सोच (मनुवाद से मानववाद) और प्रशासनिक शक्ति से, ये जता दिया कि पैसा, बुद्धी और शौर्य किसी खास जाति की जागीर नहीं है।
हालांकि कुछ सियाने इसमें में कमियां निकाल लेते है, कि दलित होने की वजह से व्यक्तित्व मजबूत नहीं होता। जिस तर्ज पर सुभाष-भगत सिहं ने गांधी की आंधी के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ी थी। वो मादा बाबासाहब में नहीं था, वो तो धर्म की जंग भी हार गये और मरने से पहले हिन्दू धर्म को त्याग कर बुद्धं धर्मं गच्छामि बन गये थे। जिस जोश के साथ जेपी, चरणसिंह कांग्रेस राज के खिलाफ खड़े हुये थे वो ताकत बहनजी की बसपा ने कभी नहीं दिखाई, वो तो बीजेपी, सपा और कांग्रेसी समेत सभी घाट का पानी पी चुकी हैं। लेकिन जन्नत की हकीकत तो यही है कि, इन दोनों के अपनी जाति का जलवा पहले-पहल भारतीय लोकतंत्र में दर्ज जरुर करवा ही दिया। आज पंजाब-हरियाणा में दलित-गुरुओं के डेरो का डंका है। रोटी-बेटी का रिश्ता चाहें अभी दूर की कौड़ी हो लेकिन छुआछूत का कलंक मिट चुका हैं।
जो जातियां खुद को अगड़ी मानती है, वो भी आरक्षण की हड्डी के आगे, अपनी लालची लार टपकाये, दुम हिलाती दिखाई देती है..उसका उत्थान भी राज्य से हुआ था और दलितो का भी राजनीति से हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे नंदवंश ने पालि, मौर्य ने प्राकृत, गुप्त ने संस्कृति, खिलजी-तुगलक ने अरबी, मुगलों से खारसी और कांग्रेस ने हिन्दी को बढ़ावा देकर राज-भाषा बना दिया। लेकिन क्या इस जातिगत अवतार का रास्ता आरक्षण की नीति से तय होगा क्योंकि विश्व इतिहास साक्षी है कि सोवियतसंघ में जिन मजदूरो-किनासो की CPSU से बुरजवा कार्ति की नींव रखी थी..बाद में वहीं अभिजात वर्ग बन गये और रुसी विभाजन का कारण बने। आरक्षण भी एक जाति में एक अभिजात वर्ग का रचयिता है। कैसे रामविसाल के बेटे को आरक्षण किया जा सका है? कैसे दलितो पर जुल्म करने वाले, अमीर किसान जात OBC हो सकते हैं? क्योंकि पढ़ा लिखा मुस्लमान कहता है कि काश वो हिन्दू होता और पिछड़ा हिन्दू होता?
इन सावलो के जवाब मेरे पास नहीं है, ऐसा नहीं है की मेने इसका जवाब खोजने की कोशिश नहीं की Y4E और आरक्षण विरोधी मुहिम, समान भारत की जंग में मैं भी लड़ा था, लेकिन जाति का जंजाल बहुत-बलवान हैं। ये सवर्णों में (बाहमण-क्षत्रिय) में लड़ाई करवा जाता है, दलितो में (अभिजात और पिछड़े) में बंटवारा कर जाता है। जाति है कि जाती नहीं..ना रोटी से ना बेटी से..ना लोकतंत्र से ना भीड़तंत्र से..ना लव-मेरिजों से ना इंटरनेट से...। इसका जवाब मेरे पास नहीं, आपके पास हो प्लीज बता दें..जाति क्यो नहीं जाती ???