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शुक्रवार, सितंबर 17

जातिगत – सच, सवाल और सरोकार

मै पहले ही आपको बता दूं, जो एतिहासिक थ्योरी मैं रखने जा रहा हूं..उससे मै भी पूरी तरह सहमत नहीं हूं और न ही वो परिपूर्ण है। किसी जाति का उत्थान कैसे होता है ? ये सवाल भारतीय समाजशास्त्र में गूढ़ रहस्य है। सविंधान सभा के कुछ सदस्यों को इसका जबाव बिट्रिश-लोकतंत्र की देन - आरक्षण में नज़र आया..हालांकि कुछ जानकार आरक्षण को महज बिट्रिश या पश्चिम की देन नहीं मानते..जब मुनस्मत्रि को पढ़ने का हक केवल सवर्णों और खासतौर पर पंडितो को दिया गया था, वहीं अगर कोई स्त्री या शूद्र इसे देख या सुन भी ले तो उसके उपर अनेक दंड दिए जाने के विधान थे, वो भी एक तरह का आरक्षित विधान ही था। जैसे हिन्दु इतिहास में परशुराम से पहले राज अधिकार महज क्षत्रियों को था..बाद में मौर्य (मयूर पालक), फिर गुप्त (गुप्ता) भी राज के ताज से नवाज़े गए।

लेकिन सवाल जस का तस है, कि कैसे किसी जाति का उत्थान सम्भव होता है। इसके लिये कुछ तथ्यों को भी लिया जा सकता है। जैसे गुप्त काल (350ई) तक राजपूतों (ठाकुर) को उदंड लड़ाके माना जाता था, उस दौर में वो हूर्ण कहलाये। लेकिन 606ई में राजा हर्षवर्धन के पतन के बाद राजपूतों से साथ भी राजवंश जुड़ने लगा..चौहान, पाल आदि। जब पहले-पहल अरबी हमलावर (मुस्लिम) ने भारत का रुख किया तो उसका सामना राजपूतानी तलवारों से हुआ। उस वक्त जाटों (चौधरी) को आदिवासी जाति माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कुछ सौ साल पहले राजपूतों के लिये कहा गया था। एतिहासिक शाक्षय है, कि जब मुहम्मद गजनवी का लश्कर लौट रहा था.. तो जाट कबीलों से उन पर पीछे से हमला किया..हालांकि उसमें जाटों को मुंह की खानी पड़ी..लूट की कीमत उनकी औरतों तक को चुकानी पड़ी।

वक्त कभी एक सा नहीं रहता.मुगलो के उत्थान में जिस तरह पृथ्वीराज, राणा सांघा और महाराणाप्रताप की कहानियां किस्से बन चुकी थी..तब तक राजपूतों के सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाने लगा था..वैसे ही मुगलों के पतन के करीब मर्द-मराठा (शिवाजी), चंद्रवशीं-जाट (सूर्जमल) और खालसा-जटसिख (रंजीतसिहं) के राज्यों और करनामों ने भी इन जातियों को भी क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग बना दिया। इन्हें ब्रिटिश आर्मी में भी मार्शल रेंज माना गया।

1857 के पहले हुई आदिवासी क्रांतियों से गुर्जर लुटरे से वीर कहलाने लगे, खुद को वासुदेव कृष्ण के जोड़कर अहिर (यादव) की यदुवंशी क्षत्रिय मानने लगे..लेकिन राज ना होने की वजह से गुर्जरों और यादवों को, ठाकुर (राजपूत)- चौधरी (जाट) का सम्मान नहीं मिल पाया।

1947 में मुल्क-बंटा, नया वोटबैंक भी बना सो जातिगत सियासत ने उन्हें सम्मान दिलाने की कोशिश भी की..मैने अपने जीवनकाल में देखा, कि जब मुलायम सिंह यादव सूबे के वजीर (उत्तर-प्रदेश) बने तो उनकी सुरक्षा में लगा कोई भी जवान अहिर नहीं था। यादव (राव-साहब) ने फिर एक मुहिम चलाई और यूपी पुलिस में यादवों का आकड़ा बढ़ने लगा, कुछ लोग उसे यूपी-पुलिस में हुई भर्तियों के घोटाले से भी जोड़ते हैं। बिहार में लालू जी की सत्ता-स्थापित हुई तो..तथाकथित भूमिहार कहा - अब गाय चराने वाले लल्लू भी सूबे की सरकार संभालेंगे...। लेकिन दोनों यादवों ने यादव जाति को राज और राजनीति में स्थान दिला दिया। आज यादव भले ही ओबीसी का अंग हो, लेकिन किसी भी तर्क (आर्थिक-सामाजिक) पर पिछड़े नहीं कहलाये जा सकते हैं।

अब बात करें गांधी के हरिजनों की या बाबा के दलितों की..बाबासाहब और बहजनी को छोड़कर कोई बड़ा उलटफेर करने वाली शख्सियत इनके लिये नहीं रही। हालांकि राममोहन राय, गांधी जैसे अगड़ो-पिछड़ो के उत्थान का बीड़ा उठाया या फिर साहूजी मानंद्य कुछ समाजसुधार कार्य हुई। लेकिन बड़ा उलटफेर पूना-पैक्ट (1942) के वक्त देखने में आया। जब देश के सबसे बड़े नेता गांधी के समकक्ष अम्बेडकर ने बैठक की..और जातिगत आरक्षण की नींव भी कहीं ना कहीं उसी से पड़ी। फिर मायावती ने अपने गहनों-सियासी सोच (मनुवाद से मानववाद) और प्रशासनिक शक्ति से, ये जता दिया कि पैसा, बुद्धी और शौर्य किसी खास जाति की जागीर नहीं है।

हालांकि कुछ सियाने इसमें में कमियां निकाल लेते है, कि दलित होने की वजह से व्यक्तित्व मजबूत नहीं होता। जिस तर्ज पर सुभाष-भगत सिहं ने गांधी की आंधी के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ी थी। वो मादा बाबासाहब में नहीं था, वो तो धर्म की जंग भी हार गये और मरने से पहले हिन्दू धर्म को त्याग कर बुद्धं धर्मं गच्छामि बन गये थे। जिस जोश के साथ जेपी, चरणसिंह कांग्रेस राज के खिलाफ खड़े हुये थे वो ताकत बहनजी की बसपा ने कभी नहीं दिखाई, वो तो बीजेपी, सपा और कांग्रेसी समेत सभी घाट का पानी पी चुकी हैं। लेकिन जन्नत की हकीकत तो यही है कि, इन दोनों के अपनी जाति का जलवा पहले-पहल भारतीय लोकतंत्र में दर्ज जरुर करवा ही दिया। आज पंजाब-हरियाणा में दलित-गुरुओं के डेरो का डंका है। रोटी-बेटी का रिश्ता चाहें अभी दूर की कौड़ी हो लेकिन छुआछूत का कलंक मिट चुका हैं।

जो जातियां खुद को अगड़ी मानती है, वो भी आरक्षण की हड्डी के आगे, अपनी लालची लार टपकाये, दुम हिलाती दिखाई देती है..उसका उत्थान भी राज्य से हुआ था और दलितो का भी राजनीति से हो रहा है। ठीक वैसे ही जैसे नंदवंश ने पालि, मौर्य ने प्राकृत, गुप्त ने संस्कृति, खिलजी-तुगलक ने अरबी, मुगलों से खारसी और कांग्रेस ने हिन्दी को बढ़ावा देकर राज-भाषा बना दिया। लेकिन क्या इस जातिगत अवतार का रास्ता आरक्षण की नीति से तय होगा क्योंकि विश्व इतिहास साक्षी है कि सोवियतसंघ में जिन मजदूरो-किनासो की CPSU से बुरजवा कार्ति की नींव रखी थी..बाद में वहीं अभिजात वर्ग बन गये और रुसी विभाजन का कारण बने। आरक्षण भी एक जाति में एक अभिजात वर्ग का रचयिता है। कैसे रामविसाल के बेटे को आरक्षण किया जा सका है? कैसे दलितो पर जुल्म करने वाले, अमीर किसान जात OBC हो सकते हैं? क्योंकि पढ़ा लिखा मुस्लमान कहता है कि काश वो हिन्दू होता और पिछड़ा हिन्दू होता?

इन सावलो के जवाब मेरे पास नहीं है, ऐसा नहीं है की मेने इसका जवाब खोजने की कोशिश नहीं की Y4E और आरक्षण विरोधी मुहिम, समान भारत की जंग में मैं भी लड़ा था, लेकिन जाति का जंजाल बहुत-बलवान हैं। ये सवर्णों में (बाहमण-क्षत्रिय) में लड़ाई करवा जाता है, दलितो में (अभिजात और पिछड़े) में बंटवारा कर जाता है। जाति है कि जाती नहीं..ना रोटी से ना बेटी से..ना लोकतंत्र से ना भीड़तंत्र से..ना लव-मेरिजों से ना इंटरनेट से...। इसका जवाब मेरे पास नहीं, आपके पास हो प्लीज बता दें..जाति क्यो नहीं जाती ???

गुरुवार, सितंबर 2

ये बाबरी लीला किसके लिये - इंसान, भगवान या सियासी शैतान?

दिसम्बर 1992 में, मै बहुत उत्साहित था घर के ब्लैक एंड वाइट टीवी में सरकारी डीडी पर खबरें महीनें की शुरुवात से दिखाई जा रही थी,कि देश में बहुत बड़ा होने वाला है। दिल्ली की सबसे बड़ी कोर्ट उसे रोकना चाहती थी और दिल्ली(केंद्र)के साथ साथ लखनऊ(राज्य)सरकारें उसे रोकने के दिखावें का दम भर रही थी। मैं उत्साहित था, क्योकि 5-6 साल की उम्र में आम बच्चों की तरह मुझे भी रामलीला देखना का शौक था। खासतौर पर आखरी 3-4 दिन क्योंकि उस वक्त राम-रावण का युद्ध होता है..सभी बच्चो की तरह मुझे भी मज़ा आता और मैं तालियां बजाता था। रामलीला हुये महज दो मास गजुरें थे, सो बाबरी-विवाद पांच साल के बच्चे को तमाशा या नौटकीं सा लगता था।

मै नहीं जानता था ये मोहल्ले का मेला नहीं मुल्क का मातम होगा। राम-रामण का युद्ध नहीं राम-रहीम की मानवता की मौत होगी। जिसकी लपटों में दशहरें का दहन नहीं गोधरा की रेल जलेगी, दिपावली के पटाखें नहीं मुबंई में बंम फटेंगें, ईद की सेवइयां नहीं गुजरात का सन्नाटा मिलेगा और हिन्दू-मुस्लिस (हम) से हिन्दुस्तान बनेगा नहीं हिंसा-मातम (हम) से हिंद बंटेगा। अख़बर जो खुद को बादशाहं ऐ हिन्दौस्तान कहलवा कर खुश होता था, उसी हिन्दौस्तान को आडवनी अपनी वाणी में हिन्दुस्तान कहकर कोमी खुशी का अंत करेगा। अयोध्या तो बस झांकी है अभी मधुरा-काशी बाकी है जैसे नारों पर चंद भगवा बदावत करेगें, साधवी-प्रज्ञा आंतकी बनेगी और जिहाद के जहर से कहफेआज़मी का आजमगढ़ं आतंक का अंधा कुवा बना जाएगा।

बचपन की रामलीला में तीर नकली होते थे, जिसे चलाने पर तालियां मिलती थी फिर आज अमन का अंत करने वालो को गालियो की जगह वोट क्यो मिल जाते है। मै बच्चे से बड़ा हो गया, पहली कक्षा से पत्रकार बन गया लेकिन ये इसका जवाब आज तक नहीं मिला। गांधी के रामराज्य और बीजेपी के रामराज्य में फर्क हो सकता है, लेकिन राम दोनो में कॉमन फेक्टर है। क्यों राज्य के चलाने लिये हमें राजा (राम जैसा अच्छा या रावण जैसा बुरा) की जरुरत पड़ती है, चाहे वो हिन्दुओं का राम हो या मुसलिमों का खलीफा। प्रजा, जनता क्यो नहीं बनती ?

रामलीला का एक और वाक्या याकीन याद है। जब राम-सीता की शादी होती है, रिक्षी ज्यौतिष के हिसाब से जोड़े के मंगल भविष्य की आकाशवाणी करत है, सभी गुण मिलाते, कुणलियां दिखाते है। ठीक वैसे ही मीडियां और बुद्धीजीवी मनमोहन सरकार का मगंल गान करते है। खुद अर्थशास्त्री प्रजानमत्रीं हमें भारत का भविष्य लालकिले की प्राचीन के लिखा खाते हैं..लेकिन हम लोगों को वनवास की जगह महगांई डायन मिलती हैं। सुरपनाखा की तरह राजपुत्र लक्षमण यानी तथाकथित अगड़ी क्षत्रिये जातियों (खाप-पंचायतों) ने प्रेम-विवाह या गोत्र विवाह के नाम पर प्यार करने वालो की बलि दे दी और हमारे नेता राम के समान पास खड़े देखते रहे। बाली बने भुमाफिया-उद्योपतियों ने किसाने के उनकी जमीने छीन ली, लेकिन कोई राम नहीं पहुते। राम (नेता) पहुते भी तो कैसे वो तो बह्मास्त्र प्राप्ति के लिये न्यूकलियर बिल का हवन करने मे बिजी थे। परमाणु करवार पर कानून आ सकता है जिसका फायद दशको बाद मिलेगा पर जमीन-अधिगर्हन पर नहीं जिसकी कीमत किसान आत्महत्या करके, नक्सली रास्ता अपनाकर या शहरी-बंजारे बनकर चुका रहे है।

ऐसे राम का क्या फायदा तो अपनी स्त्री को सम्मान ना दिला पाये। आपने पास बैठना का हक उससे छीन ले। ठीक वैसे ही जैसे संसद में कुछ सिलासी लोग महिला बिल पर कर रहे है। आज कोर्ट का जजमेंट बाबरी मसले पर आने वाला है, लेकिन आज मैं उत्साहित नहीं हु..उससे पहले ही अपनी विचार-लीला की कहानी सा ब्लॉक लिख रहा हु..क्योकि शायद कुछ नहीं बदला चाहे बात हर साल की रामलीला की हो या पांच साल के चुनावो की..प्रजा का काम तालियां बजाना है गालियां सुनाने के लिये तो राम-राज्य के नेता मौजूद है। हो सकता है इस दफा भी रावण के पुतले की जगह मजहबी लहु की लंका जले..कोई हनुमान इसे भी हाई-जेक कर ले जाये..और तुलसीदास बने हम लोग (मीडियां वाले) इस कथा को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर अपना पैशा निभाये। पर आपका क्या ? तुलसी को तो राजकवि का दर्ज मिल जाएगा..राम-रावण की तर्ज पर सरकार और विपक्ष की कहानी चलती रहेगी और आपकी चितायें जलती रहेगी..!!

लेकिन फिर ना जानें क्यो इस दफा देश कुछ बदला बदला सा लगता है। गूगल कहता है, कि इंडिया और भारत अलग है। ठीक वैसे ही जैसे मेरे घर का टीवी ब्लैक एंड वाइट से रंगीन हो गया है। जिसमें काला-सफेद झूठ ही नहीं..इंसान और इमान के सभी रंग दिखते है। सियाने कहते है कि हमारे देश में दो तरह लोग रहते है - मूक प्रजा जिस जीने के लिये जंनत नहीं महज जमीन नसीब हो जाये तो वो सियासी हुकमारनों की वोट-वदंना करते नहीं थकेगें और दूसरी तरफ इक्बाल की जम्हूरी जनता जो सियासी गलियारों सा विकास अपनी गलियों में भी चाहते है। मेरा सवाल प्रजा और जतना दोनों से है, कि क्या राम-बाबरी विवाद पर कोर्ट के फतवे-फरमान या फैसले से आपकी जमीन या जन्नत में कोई बुनियादीं अन्तर आता है ? अगर नहीं तो ये बवाल पर किसके लिये ? इंसान, भगवान या सियासी शैतान? अगर हां, तो ज्यादा उम्दा बात है, कि कम से कम कोर्ट के कानून का काला रंग, मज़हबी हिंसा के लाल-लहु से तो यकीनन बेहतर होगा..!!!

गुरुवार, अगस्त 26

भारत के ब्याह में बेबस बाराती बने – हम लोग

भारत में किसका रिश्ता बड़ा है - जाति, धर्म, वर्ग और क्षेत्र नहीं, जी नहीं..यहां रोटी और बेटी का रिश्ता सबसे बड़ा होता है। रोटी दिलाने के लिये सरकारी मनरेगा है और बेटी बचाने के लिये सरकारी कानून लेकिन दोनों बिकाऊ हैं। दोनों का सौदा होता है, कभी लड़के का बाप करता है और कभी साहूकार माई बाप।

देशी शादी में रोटी के साथ बेटी के रिश्ता साफ साफ नज़र आता हैं। बराती रोटी खाते हैं, चाहे उस भोज से ज्यादा की कीमत के तौहफो के नज़राने अदा करने पड़े, लड़की का बाप कन्यादान करता है, चाहे साथ में साइकिल से कार तक दहेज देना पड़ें। फिर भी बाराती और बाप खुश होते..आप इसे खुद-खुशी भी कह सकते हैं। आज भारत का ब्याह है, दुनिया की बारात दिल्ली आएगी, सड़कें सजी हैं, स्टेडियम सवरें हैं। खेल मंत्री कहते हैं की ठेठ देसी शादी की तर्ज पर कॉमनवेल्थ निपट जाएंगे। मुख्यमंत्री कहती हैं दिल्ली की दुल्हन तैयार है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के सभी युवाओं को ये शादी का खेल देखने स्टेडियम में आना चाहिये।

आखिर रोटी (पैसा) हम लोगों की लगी है और बेटी (इज्जत) भी हमारी ही है। रोटी और बेटी के नाते मीडिया को खेलों की मुखाल्फत छोड़ देनी चाहिए। चाहे रोटी के सरकारी चूहों के कुतरा हो, भष्टाचार के गहनों से भारत की बेटी सजी हो..लेकिन आप चुप रहिए – भारत का ब्याह है, बाराती सिर पर हैं, इज्जत की चटाई मत निकालो। सवाल छोटा सा कि क्या इस खेल के लिये दहेज जुटाना का जिम्मा सिर्फ जनता की जेब का है। क्या इस शादी से हम लोगों को रोटी मिलेगी और क्या चंद भ्रष्ट लोगों की कालिख पर चंदन का टीका भर लगाने से भारत मां भाल ऊंचा हो जाएगा।

ऐसा नहीं है इस हमाम में सभी नंगे है, कुछ कम भ्रष्ट हाकिमों में कंडोम भी पहने हैं, वरना 300 किमी मेट्रो, 30 फ्लाईओवर, सीपी की सूरत, रिंग-रोड़ की सीरत नहीं बदलती। लेकिन हम लोगों को इससे बेहतर की चाहत है। हम लोग 90 के राम राज्य की प्रजा नहीं रहे, कुछ पढ़ें-लिखे हैं, गूगल के चश्में से बसरत का बच्चा भी ये शादी देख सकता है, बिहार में लड़कियां साइकिल पर सवार हैं, यूपी के किसान चंद दानों के बदले जमीन नहीं देना चाहते और दिल्ली की बेटियां ब्याह में दहेज नहीं देना चाहती।

कभी किसी विदेशी-वेब में पढ़ा था कि भारत में 90 फीसदी महिलाओं के साथ रेप होता है, जिसे करने वाला कोई और नहीं उसका पति होता है, जिसे बिना रंजामदीं के सेक्स यानी बलात्कार को पुरुषार्थ की संज्ञा देते हैं। आज भी इस शादी के खेल में हम लोग ही सरकारी हाकिमों को दहेज दे रहे हैं और उसके बाद भ्रष्टाचार का बलात्कार भी हमी से होगा..और रोटी मिलेगी हाकिमो को।

गांधी के नज़रियें इस निकाह के देखें तो हमें असहयोग का रास्त चुनना चाहिये, क्योंकि चुनाव के वक्त तक तो हम इस रेप के घाव भूल गये होंगे। अगर राष्टमंडल खेलों को देखने कोई देशी-दर्शक पहुचें ही नहीं तो? सड़कों पर सवियर-अवज्ञया हो तो? अगर आवाम अफसरो को जता दें कि सरकार देश के सम्बल नहीं है, ज्महूरी जनता रोटी और बेटी से ऊपर उठ गई है। काली रात में दीपावली देखने के लिये हम अपना घर जला नहीं सकते..हम से हिन्दुस्तान है, इस ब्याह से भारत नहीं...!!!

रविवार, जुलाई 25

मोहल्ला बदल रहा है – बेहतर या बदतर...!!!

जो फर्क शायद घर और मकान मे है वहीं..कलोनियों और महोल्लों में भी नज़र आता है। एक रिश्तों का ताना-बाना है तो दूसरा दरकते संबधो और सपनों के बीच खड़ा ठूठ नुमा कंक्रीट का जंगल हैं। जहां एक रंगीन डिब्बे के आगे, फेसबुक के नागरिक हम लोग, गूगल से चश्मे से वर्चुवल-समाज में ब्रोडबैंड के ज़रियें ताना-बाना बुनते है।

मेरा पैदाइश दिल्ली के एक मिडल-क्लास इलाके सुभाष नगर में हुई नहीं लेकिन छुटपन में ही राजौरी-गार्डन में हम रहने लगे। पहली-पहल नगर से गार्डन रहते हुये डर लगता था। कि यहां के बच्चे अंग्रेजी बोलते होंगे, छुरी-काँटे से खाते होगें और गर्ल-फंड बनाते होगें। बहुत कुछ जुदा ही था, नगर में घरेलू-जेन सेट रखना हैसियत की बात थी, गार्डन में उसे हकीकत की निगांहो से देखा जाने लगा। जेंनसेट से काला-धुंआ निकलता है, पड़ोस की आबो-हवा में खलल डालता है, इस्तेमाल करना है तो इंनवर्टर करें। 90 के दौर में ये बात बहुत उम्दा लगती थी कि चलो किसी को तो पर्यावरण की परवाह है..लोग के घरों में बगीचे। लेकिन मेरी नंनी-आँखें उन बगीचों के अंदर से गरीचें देख नहीं पाई। आखिर गमलों में चार पौधे लगाने वाले लोगो का घर लड़की से फर्नीचर से पटा हुआ है। ठीक वैसे सी जैसे बिजली की कमी पर जेंनसेट की जगह इंनवेटर का जुगाड़, मानो इंनवेटर तो हवा से चलता है। ठेठ अमरीकी शैली..अपने मोहल्ले अच्छा दिखता रहे, मुल्क और मानवता की किसे पड़ी है।

पड़ोसी की एक लड़की बोली मुझसे दोस्त करोगें और किस करके चली गई। उस वक्त हम बच्चे Car 2 Car खेलते थे, इसे Plant 2 Plant का नवीन शहरी संस्करण कहा जा सकता है, जब पड़े कम और गाड़ियाँ ज्यादा होने लगे तो खेल का क़िस्से बदलने लगते हैं। हालाकी गाड़ियों संख्या आज जितनी नहीं थी। सरकारी अफ़सर अम्बेस्डर की सवारी करते थे, अमीर लोग फेयट पर चलते थे और नवीन अमीरीत के देन मारुती पर घूमने लगे थे। फिर एस्टीम और सीएलओ का जमाना आया और उसके बाद Plant 2 Plant की तर्ज पर Car 2 Car खेल भी ग़ायब हो गया। कारें ज्यादा हो गई थी और पार्किगं छोटी कोई आउट ही नहीं होता था।

महोल्ले के खेल फिर भी अपनी आखिरी सांसे से रहे थे, सामने का पार्क में जब शादियाँ नहीं होती थी तो किक्रिट का मेच लगता था। पड़ोस के मैदान में सर्कस का खेल होता था। आज उस पार्क में कंक्रीट का झरना लगा है और शादियाँ महोल्ले में नहीं हो सकती । कुल मिलाकर खेलना हो तो स्पोर्टस क्लब में दस हजार की फ़ीस देनी होगी और शादी रचानी ही तो दस लाख में होटल का बॉलरुम बुक कराना होगा। अब तो महोल्ले में रामलीला नहीं होती, रावण नहीं जलता, जलसा नहीं दिखता..फिर भी इसे पॉश ही सही महोल्ला कहा जाता है। जहां सर्कस लगती थी आज वहां दिल्ली के सबसे ज्यादा मॉल खड़े है, चौराहे की लाल-बत्ती खत्म करके फ्लाई-ओवर बना है, उसके उपर से ही मेट्रो गुजरती है मानो 20वी सदी का महोल्ला, 20 सास में हक्का-बक्का होकर ग्लोबल हो गया।

महोल्ला चाहे कोई भी हो खाना-और-बजाना हम लोगो शोक में शुमार हैं..पड़ोस के सरकारी स्कूल की पीछे बहुतेरे पंजाबी-ढाबे थे..आज भी पड़ोस में एक ढाबा है..जिसमें कुआं है, चटाई, गुड और खाट भी..लेकिन दाल की कीमत महज 1000 रुपये है। आखिर उसमें खेतो सी हवा एसी से आती है, कुऐ में पानी बिजली से चलता है और खाट महज दिखाने के लिये है बैठने के लिये नहीं। महोल्ले के घरों में जब फर्ज़ की जगह आइस-बॉक्स होता था जो खाना हर दफा ताज़ा बनता था..अब तो पिज्जा-पास्ता डीलीवर-मेन के स्कूटर से आते-आते ही बासी लगता है पर चप्पल-जुते एसी शो-रुम में सजे तरो-ताज़ा प्रतीत होते है।

महोल्ले के मायने बदल रहे है, मुझे पता है की मेरे फेसबुक पर 1350 दोस्त है लेकिन सामने वाले घर में कितने लोगो का परिवार रहता है ये नहीं पता। शायद पड़ोसी अंकल से ज्यादा मुझे गेट का गार्ड पहचानता होगा...क्योंकि अक्सर रात को उसी के दर्शन होते है। आज बच्चे X-Box3 में खेलते मजबूर है..आखिर पार्क तो खेलने के लिये बचे नहीं, बिजली कम जाती, महोल्ला रोशन रहता है..इतना रोशन कि, आसमान के तारे भी नहीं दिखते..। शादियों में दसी-ठुमके नहीं क्यूबा का सालसा दिखता है..चलो कम से कम अभी तक शादियों का रियाज़ तो है कल हो ना हो..जैसे आज शेर सर्कस में ना सही चिड़ियां-घर में तो मिलते..क्या पता कल वहीं बस चिड़िया ही दिखे।

जो महोल्ले बदल नहीं बाते पाते, उनमें ठसक रहती है, ठाठ नहीं..जैसे दरीयांगंज से दरीया (यमुना) दूर हो गई और गंज (महोल्ला)से गंजा बन गया है। राजौरी ने अपने रंग और रगीनं रखे, तभी तो उसका नाम है..पर नाम की नुमाइश से महोल्ले का नाते दरक जाते है और दरकते रिश्तों की रहीसी से दिल लगाना न्यु डेली की फितरत हो सकती है..देसी दिल्ली की रवायत नहीं।

गुरुवार, जुलाई 15

सपेरो के देश नहीं, संसान का गुरु है - भारत

संसार भारत को विश्वगुरु की संज्ञा देता है, अर्थात विश्व को ज्ञान और विज्ञान का पाठ पढ़ाने वाला अध्यापक। समूचे विश्व धरातल के रंगमंच पर हमारे मुल्क का किरदार भी एक टीचर जैसा ही रहा है। उसके कभी प्रीचर बनने की कोशिश नहीं की। भारत ने कभी नहीं विश्व को कभी नहीं बताया कि उसके विज्ञान का अविष्कार मिस्र के फैरो से पहले, मसोपोटामिया की कब्रों से पहले, एथेंस के शहरों से पहले, चीन की दीवार से पहले, रोम की रियासत से पहले, सिधुं और गगां के मैदानो में हुआ था।

दुनिया के बेहतरीन शहर न्यूयार्क के नगरों में जल निकास(नालियों) की व्यवस्था के पीछे हड़प्पा की जल निकास व्यवस्था का हाथ है। जिसकी नालियां सात से दस फुट चौड़ी और दो फुट गहरी थी, उसे कपास और पत्थर से ढका जाता है। न्यूयार्क ही नहीं महोब्त और नाव के शहर वेनिस की सोच भी सिधुंघाटी सभ्यता के विज्ञान की देन हैं । जिसमें 2700 ईसापुर्व में ही संसार के सबसे बड़े स्नानागार का निर्माण किया गाया था। चीन की महान दीवार बनने से दो हज़ार साल पहले ही बालाकोट में मजबूत ईटो की भट्टियां रहा करती थी। सिकंदर का देश स्पाटा खुद को युद्ध कला का सबसे बड़ा कलाकार भले ही माने लेकिन तलवार की खोज भारत ने 2300 ई.पू में ही कर ली थी। रोमनो की खेती की नींव भी भारत के हल से पड़ी थी, जिसका अविष्कार 1900 ई.पू में हो चुका था। जिस पेरिस के आइफिल टावर को सात अजूबो में शुमार किया गया है। लोहे की इस इमारत में जंग ना आने की वजह कभी किसी के जहन में नहीं आई। इस संदर्भ में आपको बता दें कि इसके पीछे भी भारत का विज्ञान है। ठीक वैसे ही जैसे अशोक का लौह स्तंभ हजारों साल पुराना होकर भी जंग से अछूता है।

लेकिन फिर भी अगर आपको यह अविष्कार और खोज शुद्ध विज्ञान नहीं लगते तो याद रहे भारतीय विज्ञान की फेहरिस्त किसी फलसफे से भी लम्बी है। आधुनिक चिकित्सा के जन्म से पहले 1500 ई.पू में ही भारत में मोतियाबिंद का ईलाज मुमकिन था, जिसके लिये गर्म मक्खन की पट्टियों का इस्तेमाल किया जाता था। रोम के लोग कांच के गिलास को भारत में आकार लेते थे, नैश का पशु चिकित्सा विज्ञान उस वक्त अतुल्य था, अजंता की गुफाओं में उखेरे चित्रों के रंग बेजोड़ थे। यह प्रमाण है की भारत सदा से विश्वगुरु रहा है चाहे वो लिच्छवी-गंणतंत्र की कला हो, चाणक्य के अर्थशास्त्र की राजनीति, तक्षशिला-नांलगा का ज्ञान या आर्यभट और भास्कराचार्य का विज्ञान।

प्राचीन भारत से नहीं मध्यकालीन हिन्दुस्तान भी विज्ञान के ज्ञान से अछूता नहीं रहा। जब समूचा युरोप अंधकारयुग में लीन था, चर्च के घंटो के आगे गैलिलियों की गोल धरती चपटी हो जाती थी, न्यूटन के नियमों को रोमन सामंत झूठा करार दे रहे थे, तब भी इस मुल्क ने विकास के नये पैमाने तय किये गये थे। दुनियां बारुद की खोज का श्रेय भले भी चीन को देती हो, लेकिन दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में इसके खोज चीन से कहीं पहले की गई थी। प्रशा तलकालीन जर्मनी, ब्रिट्रेन और नेपोलिनय बोनापाट के फ्रांस के पहले कागज़ के नोट दिल्ली में चलते थे। दुनियां में पहली बार महुम्द बिन तुगलक ने काग़जी मुद्रा की शुरुआत करवाई थी। 1782 में टीपू सुल्तान के पिता हैदरअली अपनी सेना में शॉट गन का इस्तेमाल करते थे, जिसकी ताकत को दुनिया प्रथम-विश्वयुद्ध तक पहचान भी नहीं पाई। उसी दौर में मराठा सेना राकेट के प्रयोग में निपुण हो गई थी, हालांकि संसार इसे चलाना एडॉल्फ हिटलर के काल में सीख पाया। दिल्ली और जयपुर के जंतर-मंतर खगोल विज्ञान की प्रयोगशाला ही नहीं, उस काल में संसार की सबसे सटीक घड़ी भी रहे है।

कुछ लोगों का भारत के लिये मानना है की जब सूर्य पश्चिम में उदित होता है तो पूर्व में काली रात की शुरुआत हो जाती है। अर्थात जब पूंजीवाद और उद्योगीकरण से लंदन और पेरिस आबाद हुये तब तक भारत का विज्ञान बर्बाद हो चुका था। ऐसे विज्ञानों को भारत के विज्ञान से पहले अपने ज्ञान की खोज-खबर कर लेनी चाहिये। पेड़ो-पोधो में जान होती है, इस ज्ञान को बुद्घ और माहावीर जी सदियों पहले ही अपने अनुयायियों को दे चुके थे। लेकिन 1920 में जगदीश चंद्रबोस ने विश्व में पहली बार अपने वैज्ञानिक प्रमाण से साबित कर दिया। सी.वी.रमन, होमी भाभा, विक्रम साराभाई के हुनर और विज्ञान का लोहा सारा संसार मानता है।

आजादी के बाद भारत के कदम भविष्य के रास्ते पर जब नहीं रूके तो पश्चिम ने उसके रास्ते पर रोड़े डालने की कोशिशें जरुर की। पश्चिम के देशों का मानना था कि आखिर तीसरी दुनिया का पिछड़ा देश, कैसे दुनिया के विज्ञान में आगे हो सकता है। जब अमेरिका ने अपने बेकार लाल गेंहू यानी पीएल-480 हमें भीख में मुहैया कराये तो हमने हरित-क्रांति की राह खोज ली। जब खेती के लिये हमें बिजली की कमी खली तब हमने भाखड़ा-नांगल बाधं बनाया जो दुनिया भर में बेजोड़ है। जब पाकिस्तान और चीन कश्मीर की सीमा पर अपनी सेनाओं को बढ़ाने लगे तो हमने संसार के सबसे ऊंचे लेह-लद्दाख हाइ-वे के निर्माण कर डाला। तारापुर में न्यूक्लियर इंधन देने में विदेशी सरकारें आना-कानी करने लगी तो भारत ने पोखरण-एक में खुद ही परमाणु परीक्षण कर डाला। 1998 के पोखरण-दो के बाद जब पश्चिम अपनी पूजीं और विज्ञान पर अकड़ जमाकर भारत पर प्रतिबंध लगा रहा था तो हमने स्वदेशी लड़ाकू हवाई जहाज तेजर, बीजींग तक मार करने वाली अग्नि-3 और अंतरिक्ष में भारत को उड़ान भरने के लिये जीएसएलवी और पीएसएलवी लॉच सेटेलाइट बना दिये।

भारत के विज्ञान की गाथा यहीं नहीं रुकी। दुनिया का तीसरा सुपर कम्प्यूटर – परम2000 हमारे देश में बना, एम्म का नाम एशिया के बहतरीन मेडिकल-कॉलजों में शुमार है। आईआईटी और आईआईएम की धाक समूचा विश्व मानता है। बीएचयू, डीयू, जेएनयू ज्ञान और विज्ञान के महान केंद्र है। नासा में 34% , माईक्रोसोफ्ट में 31% , आईबीएम में 27% भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर हैं। यूरोप और अमेरिका में हर तीसरा डॉक्टर हिन्दुस्तानी है। आज भारत दुनिया की छठी अंतरिक्ष शक्ति, पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, चौथी सैन्य ताकत है। यह तो महज आगाज़ है प्रथम पंक्ति के भारत का। भारत में ज्ञान दिलों में और विज्ञान दिमाग में दौड़ता है। सुई से लेकर एटम बम इस देश में बनाये जाते है। संसार इसे विश्वगुरु यू ही नहीं कहता। भारत बीते हुये कल से आने वाले कल की तरफ एक बार फिर समूचे विश्व को भविष्य के विज्ञान के रास्ते पर लेकर आगे बढ़ रहा है।