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सोमवार, जून 18

इंसान: इतिहान बनेगा या इतिहास बनाएगा!

हमारी पीढ़ी पर दो साइंस फिक्शन फिल्म या यूं कहा जाए 2 साइंस फिक्शन की धाराओं का बुनियादी असर पड़ा। यहां पीढ़ी का अर्थ है, जिनका बचपन 90 के दशक में गुजरा हो, वह दशक जब भारत में अर्थव्यवस्था के खिड़की और बाजार के दरवाजे विश्व के लिए खोल दिए थे। वह दशक जब सब कुछ नया नजर आ रहा था, उस दशक में दो फिल्मों की सीरीज की खासी अहमियत रहती थी।  जिसके सीक्वल आज भी बच्चों और युवाओं को नए अंदाज में नई दुनिया के दर्शन कराते हैं "टर्मिनेटर और जुरासिक पार्क"।

यह सिर्फ दो फिल्में ही नहीं भविष्य की दो धाराएं भी हैं। जो वर्तमान को डराते रहते हैं, एक है एआई की तकनीक, दूसरी है पुरातन का नूतन रूप।  एक में वो इतिहास दिखाया जो वर्तमान में डायनासोर के रूप में खड़ा हो जाता है, जो जेनेटिक और DNA के प्रयोग से ऐसे जुरासिक काल के मांसाहारी प्राणी के रुप में सिल्वर स्क्रीन पर ऐसे नजर आए मानो, उनमें मानव की बुद्धि हो, दानव की ताकत और देवताओं की अलौकिक कला..।

वही भविष्य को वर्तमान में दिखाने की कोशिश टर्मिनेटर ने दिखाई कि कैसे एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंसान के चेतन मस्तिष्क को आदिमानव से बौना समझता है और जानता है कि भविष्य मानव नहीं मशीन तय करेंगी।

ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ सिल्वर स्क्रीन की तकनीकी कल्पना हो, बल्कि इसका सरोकार ऐसे भविष्य से है। जो जितना ललचाता है, उतना ही डर आता भी है। DNA को समझे बमुश्किल तीन-चार दशकों का दौर गुजरा है और अभी से हम DNA के जरिए कैंसर जैसी बीमारी के इलाज की वास्तविक कोशिश करने लगे हैं। वैज्ञानिकों की माने तो आने वाले चंद दशकों के अंदर हम अपने बच्चों के भविष्य को गर्भ में ही तय कर पाएंगे। DNA के जरिए हम यह पहली ही तय कर लेंगे कि उससे बुद्धि ज्यादा देनी है या बल। आज भी लाइफ-कार्ड के जरिए स्टेम सेल्स को संरक्षित करना आम हो चुका है। जिसके जरिए DNA की जैविक ताकत का प्रयोग किया जा सकता है।

अभी तकनीक हड्डियों से डायनासोर के DNA को जिंदा करने की ताकत नहीं रखती। फिर भी विज्ञान के शुरुआती दौर में छोटा ही सही पहला कदम हमने रख लिया है। कई सरकारें आज भी इससे डरी हुई है, तभी ज्यादातर उन्नत जैविक और डीएनए के प्रयोग इंटरनेशनल वाटर में किए जाते हैं, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय समुंद्र वह क्षेत्र है जहां किसी देश के राष्ट्रीय कानून नहीं चलता हैं। वैज्ञानिकों का एक वर्ग डायनासोर जैसी प्रजाति तो नहीं, लेकिन इंसान के शरीर को DNA के जरिए विकसित करना चाहता है।  जिससे एड्स और कैंसर का इलाज ही नहीं बल्कि महामानव का जन्म हो, जबकि वैज्ञानिकों का दूसरा वर्ग इतना डरा हुआ है, कि उन्हें लगता है कि बतौर ह्यूमन सेपियन यह सदी हमारी आखरी सदी होगी। इसके बाद ऐसे महामानव का विकास DNA के जरिए होगा जिसे प्राकृतिक रूप से विकसित होने में लाखों साल लग जाते।

ऐसे विकास से डरना लाजमी है, क्योंकि तब इंसान आज से कहीं अधिक शक्तिशाली होगा और आज का मानव भी प्रकृति और पृथ्वी ही नहीं खुद न्युक्लियर पावर की वजह से अपनी अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा। हमारी सदी के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में से एक स्टीफन हॉकिंग्स में कुछ ही सालों पहले भविष्यवाणी की थी कि, मानव अस्तित्व को सबसे बड़ा खतरा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भविष्य से है।

अब बात करते हैं टर्मिनेटर की बुनियादी सोच की, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अहम किरदार अदा करती है। आपको लगता होगा कि टर्मिनेटर के रोबोट ह्यूमन बॉडी आर्नोल्ड जैसा विकास हमें दूर तक नहीं दिखता, लेकिन जो आज हो रहा है वह भी किसी करिश्मा से कम नहीं है। इसकी बुनियाद हमें 1955-56 तक ले जाती है, जब अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शब्द को पहली बार एक सेमिनार में प्रयोग किया था । जिसके बाद 80 के दशक तक जापान, ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन ने भी ऐआई को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी नीतियों के तहत प्रयास शुरू कर दिए। यहां तक की 2017 में  भारत की नीति आयोग ने भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बढ़ावा देने के लिए नीति बनाने की शुरुवात की है, हालांकि हम सॉफ्टवेयर सुपर पावर बनने के बावजूद दुनिया से काफी पिछड़े हुए हैं।

मौजूदा दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आपको हर जगह नजर आती है। भले ही उसकी शक्ल और शक्तियां ट्रांसफार्मर से अलग हो, पर वह है जरूर। एक दशक पहले जब iPhone ने सीरी का प्रयोग किया तो हमें वह एक खिलौना लगती थी, एक ऐसा खिलौना जो हमारे सवालों के जवाब देने की कोशिश करती है, पर धीरे-धीरे उसमे में मानवीय पहलू नजर आने लगे और अब तो Google ने Android के जरिए गूगल असिस्टेंट का बेहतर एआई वर्जन भी बाजार में उतार दिया है। कभी सोचा है कि आपका Facebook सजस्टिस फ्रेंड्स कैसे ढूंढता है उसके पीछे भी एआई है और जब आप गुगल मैप पर होम लिखते है तो वो आपको आपके घर का रास्ता बिना पता लिखे दिखाना है, क्योकि एआई जानता है की आप दफ्तर से रोज़ शाम कहां जाते है, उसी रास्ते को वो घर का पता मान लेता है।

कौन सोच सकता था, वह देश जहां लोकतंत्र नहीं राजशाही हो, यहां के कानून को सभ्य समाज मध्यकालीन परंपराओं से जोड़ता हो,  ऐसे सऊदी अरब में दुनिया की पहली रोबोट सोफिया बन जाएगी, जिसे सऊदी की नागरिकता मिल जाए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हर जगह है, आप के फोन से लेकर आधार कार्ड तक। जिसमें चीन सबसे व्यापक प्रयोग करता हुआ नजर आ रहा है। जहां सीसीटीवी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को कुछ इस कदर जोड़ा गया है, जो लाखों करोड़ों कैमरों से अपने नागरिकों पर पैनी निगाह रखता है और किसी को भी उसके फेशियल रेकोनिजेशन से पहचान सकता है और अब तो चीनी तकनीक का निर्यात भी शुरू हो गया है। यानी दुनिया का सबसे शक्तिशाली तानाशाही मुल्क चीन अपने नागरिकों पर अनदेखे जाल से नजर रखता है। यहां तक की चीन में लोग अगर अपने फ़ोन या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की चैट में रिपब्लिक, रेड आर्मी, माओ जैसे शब्द लिखते हैं तो वो अपने आप रिकॉर्डिंग मोड पर चली जाती है।

एआई हर जगह है, जहां आप सोच भी नहीं सकते वहां भी। चीन के बाद अमेरिका की बात करें, तो वह भी अपनी हेल्थ पॉलिसी को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जोड़ रहा है। यानी अगर आप बियर बार में ज्यादा वक्त गुजारते हैं तो, आपकी हेल्थ इंश्योरेंस महंगी हो जाएगी, क्योंकि आपके फोन की जीपीएस लोकेशन यह बता देगी कि आप धूम्रपान या मद्यपान ज्यादा करते हैं। वहीं युरोप के कुछ देशों में अगर अपना फिटनेस बैंड पहनकर आप 8 हज़ार कदम से कम एक दिन में चलते हैं तो डब्ल्यूएचओ के निर्देशानुसार उसे बीमारी को न्योता माना जाएगा, जिससे हेल्थ इंश्योरेंस और महंगी हो जाएगी। यानी हर जगह, आपकी हर हरकत कोई देख रहा है और वह एक इंसान की नहीं बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की है।

यह पूरा लेख भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए लिखा गया है। जिसमें वॉइस टाइपिंग कमांड का इस्तेमाल किया गया है। जो आपकी भाषा के साथ शैली को जोड़कर शब्द के उच्चारण के आधार पर उसे लिखता है। जैसे अंग्रेजी भाषा के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, युरोप, भारत, ऑस्ट्रेलिया जैसे अलग-अलग देशों और महाद्वीपों की उच्चारण शैली को अलग-अलग रखा जाता है। ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने 700 टेराबाइट जितनी सूचना संग्रह सिर्फ 1 ग्राम DNA में हासिल कर लिया है।

ऐसी में सवाल उठता है कि हमें डरना किससे चाहिए DNA या एआई क्योंकि जहां डीएनए ह्यूमंस सेपियन के तौर पर हमारे विकास की विरासत को बदलने में लगे हैं। वही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वीक एआई, से स्ट्रांग एआई और स्ट्रांग एआई से सिंगुलैरिटी में तब्दील होने की फिराक में है। जिसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को माननीय दखल की जरूरत नहीं पड़ेगी,  उदाहरण के तौर पर एक  ऐसा ड्रोन को खुद बमबारी करेगा,  बिन किसी आदेश के। एआई खुद फैसला लेगी और तय करेगी कि इस दुनिया को किस ढांचे में ढालना है।

तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए की टर्मिनेटर में दिखाया गया कयामत का दिन तय है, बस तारीख का ऐलान बाकी है और जुरासिक वर्ल्ड की तरह कोई नई स्पीशीज मौजूदा इंसान की जगह ले लेगी भले ही वह डायनोसोर नहीं भविष्य का महामानव हो जिसे DNA तकनीकी मदद से मुमकिन किया जाएगा।

आपको लग सकता है कि यह डर दिखावटी है, पर जो सच हो चुका वह दिखाने के लिए काफी है कि दुनिया बदल रही है। ऐसे में याद आता है डार्विन का वह सिद्धांत कि, सिर्फ एक चीज ऐसी है जो रुक नहीं सकते वह है बदलाव। बदलाव होता रहा है, होता रहेगा और जो नहीं बदल पाएगा वह इतिहास बन जाएगा। अब यह मौजूदा मनुष्य के हाथ में है कि वह इतिहास बनेंगे या इतिहास बनाएंगे।

शनिवार, जून 9

कैराना चुनाव: चक्रव्यूह की हर चाल

पहली नजर में कैराना के चुनाव को एक छोटा उपचुनाव माना जा सकता है, क्योंकि हुकुम सिंह की विरासत इतनी बड़ी नहीं थी जितनी गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ या उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य की फूलपुर में..। कैराना उपचुनाव को इसलिए भी छोटा माना जा सकता है, क्योंकि इस चुनाव से जीते सांसद 10 महीने से ज्यादा लोकसभा में बैठ नहीं पाएंगी, तो प्रश्नकाल में तबस्सुम हसन गन्ना के कितने सवाल पूछ पाएंगी और शून्यकाल में किसानों को लेकर कितनी बहस कर पाएगी।

कैराना के चुनाव को छोटा मान लेना सतही ही है, कैराना उस मुजफ्फरनगर के पड़ोस में बसा है जहां 2013 में दंगे हुए, जाट और मुसलमान एक दूसरे के सामने खड़े थे। कैराना वह शहरी कस्बा है, जहां 2015 में पलायन गूंजा था, और हिंदू मुस्लिम की राजनीति गरमा गई थी। फिर भी जिस चुनाव में जिन्ना नहीं गन्ना चल जाता है, फिर भी जिस चुनाव में BJP करीब 45 हज़ार मतों से हार जाती है, जबकि पांच में से चार विधायक बीजेपी के है और 4 साल पहले BJP के उम्मीदवार को 50% से ज्यादा वोट तथा ढाई लाख से बड़ी जीत हासिल हुई।

तो आखिर अंगराज कर्ण के नाम पर बसे कैराना की सियासी जमीन इतनी बदल कैसे गए ? क्या सिर्फ महागठबंधन इसकी सबसे बड़ी वजह है ? या फिर चौधरी चरण सिंह की वह विरासत जिसमें जाट और मुसलमान एक साथ नजर आते थे, आज फिर से नजर आने लगे है। या यूं कहा जाए कि जिस तरह यादव-मुसलमान वोट बैंक के रूप में जीत का समीकरण बनाते थे, आज जाट और मुसलमान बनाने लगे या फिर जाटलैंड से दशकों पहले उठी अजगर की उद्घोष से इसे जुड़ा जाए, जिसमें अहीर, जाट, राजपूत और गुर्जर मिलकर ऐसा शत्रिय समीकरण बनाते थे, जो कांग्रेस को उस दौर में धूल चटा सकता था।

यह तो हुए सिद्धांतिक मुद्दे, पर चुनाव सिद्धांतों की विचारधारा से नहीं जमीन पर वोटों से जीता जाता है। जिसमें अनेक मुद्दे हार और जीत का अंतर करते हैं। योगी सरकार की सबसे बड़ी शक्ति, कानून व्यवस्था और एनकाउंटर है। इसी छवि के सहारे योगी प्रदेश में वोट पाना चाहते हैं, लेकिन एनकाउंटर बाहुबलियों का होता है,  कानून व्यवस्था दबंग के खिलाफ काम करती है और दबंग हर जगह लाल टोपी धारी हो यह जरूरी नहीं..क्योंकि कैराना शामली ऐसे गांव से पटा हुआ है, जहां जाट समुदाय के युवा खुद को यूपी पुलिस से पीड़ित पाती है। जब बात पीड़ित और पीड़ा की चल ही पड़ी है, तो कैराना से सहारनपुर भी ज्यादा दूर नहीं है। लिहाजा जाटव और बहुलता में दलित समाज भी खुद को इस पीड़ा में शामिल और मौजूदा राज्य सरकार की नीतियों के विपरीत दिखता है।

बुद्धिजीवी मान सकते हैं कि जब मुस्लिम जाटव और जाट एक मंच पर आ जाए तो जीत का जादुई आंकड़ा पाना सरल है। लेकिन कैराना के कण-कण में अनेक मुद्दे हैं। जिसमें गन्ना भी महत्वपूर्ण है, इसलिए भी क्योंकि खुद गन्ना मंत्री सुरेश राणा कैराना की ही एक विधान सभा थानाभवन से जीतकर आते हैं। थानाभवन जहां सुरेश राणा के समजातीय राजपूत समाज का वोट 20 हज़ार से भी कम है, यानी गन्ना किसान जो जाट ही नहीं सभी जातियों में है, उनके वोट से सुरेश राणा मंत्री बनते हैं।  हर मंच से सुरेश राणा ही नहीं CM और PM भी यह बताने से बाज नहीं आती कि, सभी किसानों के गन्ने का भुगतान हो गया जबकि जमीनी हकीकत इससे इतर नजर आती है।

जब बात जाति की चल पड़ी है तो यह जानना भी जरूरी है कि दोनों उम्मीदवारों की जाति एक ही है। एक हिंदू गुर्जर, दूसरे मुस्लिम गुर्जर.. हालांकि बीजेपी यह दिखाने की कोशिश जरूर करती है कि, बड़ी संख्या में मुस्लिम गुर्जर का वोट उन्हें मिला क्योंकि, तबस्सुम हसन के परिवार की छवि दबंग की है और दबंग से डरा जाता है, उनका साथ नहीं दिया जाता।

जब गुर्जर दोनों उम्मीदवारों की जाति में शरीक हैं ,तो यह कैसे मान लिया जाए कि जाट वोट सिर्फ चरण सिंह के नाम पर जयंत चौधरी की मेहनत से अजीत सिंह की पार्टी को ही मिला होगा। जबकि बीजेपी के पास मौजूदा मंत्री सत्यपाल सिंह से लेकर पूर्व मंत्री संजीव बालियान सरीखे के जाट चेहरे मौजूद हैं। अब यह बात भी किसी से छिपी नहीं कि डॉक्टर सत्यपाल सिंह ने कैराना क्षेत्र चुनाव में बहुत ज्यादा सभाएं की नहीं क्योंकि क्षेत्रीय समीकरण की माने तो जाट जाति के वोट पर संजीव बालियान और सत्यपाल सिंह दोनों अस्तित्व की लड़ाई करते है। तो क्या यह भी संभव है कि शामली जो बागपत और मुजफ्फरनगर के बीच में है और वहीं के दो सांसद सत्यपाल सिंह और संजीव बालियान अपनी निजी वरीयता के आधार पर जाट समुदाय को एक साथ कमल के पक्ष में ला नहीं पाए..।

BJP के कुछ समर्थक तो उपचुनाव की हार में भी जीत खोज लेते हैं।  मानो ईवीएम और वीवीपैट का जवाब उपचुनाव की हार से मिल गया हो, जिससे 2019 की डगर आसान हो जाएगी, लेकिन कैराना और नूरपुर उपचुनाव में ही ईवीएम और वीवीपैट को लेकर सबसे ज्यादा सवाल खड़े हुए। जब निर्वाचन आयोग के अधिकारी खुद कहते हैं कि ईवीएम को गर्मी लग गई और मौसम की तपिश ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को ठंडा कर दिया। इसपर सियासी उबाल जरूर आ गया, जब दिल्ली में महागठबंधन के नेता एक समुदाय विशेष के क्षेत्र ईवीएम खराब होने की शिकायत लेकर पहुंचे और चुनाव आयोग ने भी बड़ी संख्या में बूथों पर पुनः निर्वाचन का आदेश सुना दिया । हालांकि दबी जुबान में कुछ अधिकारियों ने यह माना ईवीएम तो सुबह से खराब थी और सवेरे का तापमान 45 के पार माना नहीं जा सकता। लिहाजा ईवीएम और वीवीपैट के तालमेल में भी गड़बड़ी रही होगी। सवाल तो यह भी खड़ा होता है कि, जब डमी वोट मतदान से एक घंटा पहले डाला जाता है और तब ही स्थानीय प्रशासन को ईवीएम की खामियों के बारे में पता चल गया था, तो सुबह 6:00 बजे से लेकर ईवीएम ठीक करने की क्या पूरी कोशिश की गई?  हालांकि लोगों की माने तो सिर्फ एक समुदाय, वर्ग या धर्म विशेष के इलाके में ही नहीं बल्कि शामली, कैराना, थाना भवन और पांचों विधानसभा सीटों के बहुत से बूथों पर ईवीएम खराब होने की शिकायत मिली थी

शिकायत कर्ताओं ने यह भी कहा कि रमजान के रोजे की वजह से मुस्लिम समुदाय गर्मी के बीच भूखा-प्यासा रहकर दोबारा मतदान के लिए आएगा नहीं और ईवीएम खराब होने की स्थिति में ठीक होने के बाद भी वोटिंग परसेंटेज में गिरावट आएगी। फिर भी वोटिंग परसेंटेज संतोषजनक रही, आखिर आम चुनाव से अलग मतदान के लिए वक्त 10 नहीं बल्कि 11 घंटे का दिया गया था।

मतदाताओं की स्थितियां भी देखने वाली थी। जहां कुछ बुजुर्ग अपने बेटे और और पोतों के साथ या यूं कहें उनके सहारे वोट डालने आए। वही ऐसे नजरों की भी कमी नहीं थी जहां ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में बुजुर्गों को भरकर वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों पर कुछ यूं लाया गया कि मानो, मतदान की मंडी में गिनती बढ़ाने की कोशिश हो..।

भूरा गांव में कई राउंड गोलियां भी चलती है, लाठी चार्ज भी होता है और जाली मतदान से लेकर ईवीएम टेंपरिंग के आरोप पूरे संसदीय क्षेत्र में लगाए जाते हैं। ऐसे में हमारी बात एक CRPF अधिकारी से हुई जो दबी जुबान में यह बोल गए कि, जब ईवीएम टेंपर होती है, तो वोट डालने के बाद बीप की आवाज में कुछ अंतराल आ जाता है। हालांकि बिना पुख्ता सबूतों की यह आरोप विपक्षी पार्टियों के चुनावी भाषण सरीके के नजर आते हैं। हालांकि इन चुनावों में स्थानीय प्रशासन का राजनीतिक उपयोग उस तरीके का नजर नहीं आया जैसा पूर्व की सपा सरकार में देखने को मिलता था या आरोप लगाया जाता था। हो सकता है कि, योगी भी मायावती की तर्ज पर अधिकारियों को इतनी अधिकार दे बैठे हैं उन्हीं के जनप्रतिनिधि प्रशासन के प्रतिनिधियों पर बात ना सुनने का आरोप लगातार लगाते हुए नजर आते हैं।

फिर भी कैराना के नतीजे अपने आप में कई संकेत देकर गए कि, फूलपुर और गोरखपुर से उलट अगर मतदान प्रतिशत फर्स्ट डिवीजन के आसपास पहुंच जाए तो भी कमल खिलने से रुक सकता है। दंगों के दर्द को भुलाकर धुरविरोधी एक साथ आए तो पासा पलट सकता है और किसान चाहे जितनी जातियों में बटा हो पर जब वह गन्ने के नाम पर एक साथ आ जाए तो नतीजे उलट सकते हैं। फिर भी यह मान लेना बहुत जल्दबाजी होगी कि यूपी के पहले उप चुनाव की तर्ज पर कैराना BJP की दशा और महागठबंधन की दिशा दिखाता है, क्योंकि कैराना कण कण के मुद्दों से जीता और हारा गया है, इसकी गोरखपुर की पीठ से तुलना नहीं की जा सकती। फिर भी जीत जोड़ देती है महागठबंधन को और हार तोड़ देती है BJP के मनोबल को लिहाजा केराना के कण-कण को समझना जरूरी है..

गुरुवार, फ़रवरी 1

आजाद बनो..

आजाद बनो..


कभी मुहावत के पास कैद हाथी के बच्चे को देखा है। उसे जंजीरों से बांधा जाता है, लोहे से जकड़ा जाता है, वह आजाद होने की कोशिश करता है। उसके पैर लहूलुहान हो जाते हैं और वह घाव उसे बड़े होते-होते यह सिखा देते हैं कि, आजादी मुमकिन नहीं..फिर बड़े हाथी को चाहे पतली सी रस्सी से बांध दो पर वह रस्सी तोड़ने की ज़ुरत नहीं करता। क्योंकि वो अपने दिमाग से गुलाम बन चुका है..! क्या हम भी माता-पिता के तौर पर, टीचर के रूप में, समाज में रहकर, संस्कृति के नाम पर आने वाली पीढ़ी को गुलाम तो नहीं बना रहे ? कि अच्छा होने के लिए अच्छा दिखना जरूरी है। अंग्रेजी जरूरी है, मिट्टी से मोहब्बत की कसमें 15 अगस्त को तो खा सकते हो पर मिट्टी में खेलना मना है..

मां-बाप कहते हैं कि अगर कोई प्रशाद तक दे तो खाना मत.. अनजान के साथ जाना मत..अनजान बच्चों तक से बात करना मत.. टीचर जो कहते हैं वही अटल है, वही अंतिम, वही ब्रह्मा की लकीर और ब्रह्मा पर सवाल उठाना पाप है !! बचपन से ही हम हाथी के बच्चे की तरह अपने बच्चों को गुलाम बना देते हैं..वही गुलामी हमें अंजान रास्तों पर चलने से डरती है, क्योंकि छुटपन में मां ने काले बाबा या काले साए की कहानी सुनाई थी, क्योंकि पिता ने कहा था उंगली पकड़ कर चलो वरना कुत्ता काट लेगा या ठोकर खाकर गिर जाओगे.. जिन विचारों को हम मोहब्बत के लबादे में उढ़ाकर वात्सल्यता रम में सराबोर कर अपने बच्चों को दे रहे हैं, वह उन्हें डरपोक और डरपोक बनाने के लिए काफी है..

कभी किसी विदेशी को देखा है वह आप से नजरें मिलाते ही स्माइल पास कर देते हैं। क्योंकि उनकी मुस्कुराहट में डर नहीं होता और हम तो मुस्कुराने में भी मायने सोच लेते हैं। मांस खाने के लिए, शाकाहारी बनने के लिए अलग-अलग दिन। बाल कटावाने के लिए, नाखून काटने के लिए अलग-अलग वक्त। भगवान से डरना, इंसान से डरना, आज़ाद सोच से डरना... आपको मोहब्बत और विश्वास से दूर ले जाता है। यही डर हिंदुस्तान में दुनिया के सबसे ज्यादा इंजीनियर और डॉक्टर पैदा करता है पर गुगल या माइक्रोसॉफ्ट का मालिक नहीं बनने देता, क्योंकि हमें व्यापार की हानि से डरना सिखाया जाता है और मासिक वेतन में जीना सिखाया जाता है.. शायद तभी हॉटमेल बिक जाता है और उस भारतीय कपंनी पर एक विदेशी कंपनी खड़ी हो जाती है.

किताबें हमें पढ़ाती है कि मनु के वक्त वेदों से दूरी के दायरे थे..पर आज भी हमारे नेता अपनी नीति को चलाने के लिए ज्ञान से दूरी बनाते हुए नजर आते हैं। क्यों हमें यह सवाल पूछने का अधिकार नहीं कि एक देश का कोई बाप कैसे होता है? क्यों हमारे देश के बच्चे यह नहीं जानते कि महात्मा गांधी से ज्यादा भूखे पेट अनशन भगत सिंह ने अपनी जेल के दौरान किया था.. सत्य के प्रयोग सलेबस से दूर रहते हैं, गॉडसे की डायरी को दो भूल जाईये।

यह डर हमें बड़े होने के बाद भी डराने से बाज नहीं आता और कुछ लोग इसी तरह का व्यापार करने लगते हैं। वामपंथी अमीरी से डरा कर गरीबी का, दक्षिणपंथी अक्लियत से डरा कर बहुसंख्यकों का और मध्यममार्गी  अलग-अलग दायरे बनाकर हम पर राज करते हैं..

यही डर है कि हमारी आंख दुनिया को मोहब्बत की नज़रों से चूमती नहीं, क्योंकि उस पर जाति धर्म और विचारों का चश्मा लगा है। यही डर की सोच हमें सेक्स जैसे बुनियादी मुद्दों पर बात करने से डर आती है। दवाई की दुकान पर जाकर सेनेटरी पैड या कंडोम मांगना कुछ इस तरह डराता है मानो थाने के सामने कोई कोकीन खरीदने की कोशिश कर रहा हो..परिवार से लेकर परिवेश तक हम करते हैं, डरकर झूठ बोलते हैं और डर का कारोबार चलता रहता है..

निडर होने का अर्थ पागल होना नहीं, यह नास्तिक होने जैसा है और आप नास्तिक को विधर्मी या अधर्मी नहीं कह सकते। निडर होने की पहली सीढ़ी है सवाल पूछना, शालीनता के साथ लेकिन निर्भीक होकर। यहां सवाल का अर्थ सिर्फ प्रश्न बल्कि समझ भी है.. जैसे गांधी की गरिमा या गोडसे को गाली देने से पहले उन्हें पढ़ना, पढ़ कर समझना और समझ के बोलना..

निडर होने का अर्थ यह नहीं कि आप अपने समाज मुल्क या संस्कृति से ऊपर उठ गय।  निडर होने का अर्थ है आजाद सोच, व्यक्ति के विवेक की स्वतंत्रता, अनजान रास्तों पर चलने की क्षमता, और नंगी आंखों से दुनिया की अच्छाई और बुराई को निखारने की नियति..

जिस संस्कृति में हम मौलिक रूप से लिंग और योनि की पूजा करते हो.. जहां सूफी की सरलता हो और चिड़िया से बाज लड़ाने की क्षमता.. वहां डर का डमरू नहीं आजादी का उद्घोष होना चाहिए.. निडर बनो क्योंकि डर कर जीने से मर जाना बेहतर है..

बुधवार, फ़रवरी 15

Punjab Assembly Elections 2017


Uttarakhand Elections 2017

Credit to http://www.elections.in/uttarakhand/exit-poll.html


The hill state of Uttarakhand goes to elections on February 15, 2017 in single phase to select representatives to its 70-member Vidhan Sabha. Predicting the exact outcome of the Uttarakhand assembly elections can be a little tricky. Nonetheless, one thing is for certain: the race for majority is going to be a fight to the finish. The Congress will work hard to retain power in the face of anti-incumbency and its dwindling fortunes in other states. In the last Assembly elections held in 2012, no party got majority. The Congress was the single largest party and it forged a post-poll alliance with the PDF to form government in the state. The BJP was the runner-up and it sat in opposition.


Among the five states going to polls early in 2017, Uttarakhand is the only one where there is a direct fight between the Congress and Bharatiya Janata Party (BJP). The India Today-Axis Opinion Poll shows that the Congress will find it difficult to retain power in this hill state. The opinion poll has given BJP 41 to 46 seats in the 70-seat Uttarakhand legislative assembly. The Congress is predicted to win 18 to 23 seats while others could get 2-6 seats. The survey also showed that the BJP is way ahead of Congress and other parties in terms of vote share. While the BJP is expected to get 45 per cent of vote share, Congress may come a distant second with 33 per cent of vote share. Others just 22 per cent. The opinion poll shows that BJP's B.C. Khanduri is a popular choice for the chief minister's post. However, there is a tight contest between Khanduri and incumbent Harish Rawat. Prime Minister Narendra Modi's demonetisation move is not going to affect the BJP's poll prospects as a majority of respondents (79 per cent) view the note ban as good.