मेरी ब्लॉग सूची

बुधवार, फ़रवरी 15

Punjab Assembly Elections 2017


Uttarakhand Elections 2017

Credit to http://www.elections.in/uttarakhand/exit-poll.html


The hill state of Uttarakhand goes to elections on February 15, 2017 in single phase to select representatives to its 70-member Vidhan Sabha. Predicting the exact outcome of the Uttarakhand assembly elections can be a little tricky. Nonetheless, one thing is for certain: the race for majority is going to be a fight to the finish. The Congress will work hard to retain power in the face of anti-incumbency and its dwindling fortunes in other states. In the last Assembly elections held in 2012, no party got majority. The Congress was the single largest party and it forged a post-poll alliance with the PDF to form government in the state. The BJP was the runner-up and it sat in opposition.


Among the five states going to polls early in 2017, Uttarakhand is the only one where there is a direct fight between the Congress and Bharatiya Janata Party (BJP). The India Today-Axis Opinion Poll shows that the Congress will find it difficult to retain power in this hill state. The opinion poll has given BJP 41 to 46 seats in the 70-seat Uttarakhand legislative assembly. The Congress is predicted to win 18 to 23 seats while others could get 2-6 seats. The survey also showed that the BJP is way ahead of Congress and other parties in terms of vote share. While the BJP is expected to get 45 per cent of vote share, Congress may come a distant second with 33 per cent of vote share. Others just 22 per cent. The opinion poll shows that BJP's B.C. Khanduri is a popular choice for the chief minister's post. However, there is a tight contest between Khanduri and incumbent Harish Rawat. Prime Minister Narendra Modi's demonetisation move is not going to affect the BJP's poll prospects as a majority of respondents (79 per cent) view the note ban as good.


शुक्रवार, मार्च 18

राष्ट्र तो चाहिए राष्ट्रपति प्रणाली





90 के दशक का दौर था, जब हमारी सिसायत एक युवा (अपेक्षाकृत) प्रधानमंत्री के हाथों में थी, राजींव की सोच में गांधीवाद की चाहत भी थी..73वां 74वां संविधान संशोधन भी हुआ की सत्ता का विकेद्रीकरण हो क्योकि इसके पहले के पीएम के लिए कहा जाता था की वो पौधों (नेताओं) की जड़ों को रोड़ उखाड़कर देखती है, सभी सीएम की शक्ति का स्रोत केवल आयरंन लैडी के पास था लेकिन अब, कांग्रेस के एक दलिये राज के दिन लग गए थे। बंगाल और केरल लाल थे और पंजाब, हरियाण, यूपी, बिहार समेत कई राज्यों में क्षत्रिये दल सिर उठा रहे थे। तब नेताओं को लगता था की क्षेत्रियें विकास का सरोकार क्षेत्रिय दलों साध सकते है। निकाय और पंचायतों में भी गांधी का स्वराज और वेदों का ग्राम गंणतत्र नज़र आने लगा।









लेकिन आज के हालात जुदा है, संयुक्त मोर्चे की सरकार ने साल-साल के पीएम देश को दिए, बीजेपी विपक्ष में थी और कांग्रेस महज़ तीसरे मोर्चे की बैसाखी, मुलायम-लालू जैसे सीएम ना सिर्फ पीएम बनना चाहते थे बल्कि पीएम कौन होगा यह भी वहीं तय करते थे..अटल सरकार में किश्तो में ही रही 6 साल तो चली लेकिन गंटबंधन धर्म के चक्कर में विमान अपहरण या संसद, अक्क्षरधाम, विधानसभा पर आंतकी हमले लचर गटबंधन की सरकार लाचार ही दिखाई दी, मनमोहन सिंह भी अमेरिका के साथ परमाणु करार लैफ्ट के लाल झंडे की वज़ह से नहीं कर पा रहे है और अगरबारी मंत्रियों के लिए हुई गंटबंधन की बात को राडिया के फोन से देश ने देखा । 



इतिहास के संकेत साफ है की जब तक इंद्रिरा, मोदी जैसी ताकवतर छवि और सरकार के सुप्रीमों होगें हम आप्रेशन ब्लु स्टार के बाद भी भारत की एकता बनीं रहेगी, जाट हरियाणा को जलाकर भी दिल्ली को दहला नहीं पाएगें, लेकिन अगर भविष्य में फिर सत्ता की धुरी सीएम बन जाए तो..



मैं खुद देखा उन राज्यों के नेताओं को जहां हर दूसरे घर में फौजी होता और वहीं कहते की अगर राज्य नहीं बना तो चीन से सीमा का दिल्ली ही ख्याल रखें, आध्रा का संकट, गौरखालैंड का आंदौलन किस अगर हिंसक हो सकता सबसे देखा है। हमे भारत को राष्ट्रों का समुह नहीं बल्कि एक राष्ट्र के तौर पर विक्सित करना होगा जो मौजूदा सांसदीये प्रणासी से मुंकिन होता दिखता नहीं..। भारत की विभित्ताओं को ब्रिटेन, फ्रांस जैसे से नहीं तोलना चाहिए जहां एक धर्म, एक भाषा के लोग संसदीये तरीके से सरकार बनाते है, ब्लकि अमेरिका जहां भाषा, विचार, वर्गों की बहुल से राष्ट्रपति आधारिक व्यवस्था है।  



कुछ जानकार कहेगें की हमारे संविधान निर्माताओं से सोच-समझकर ही ससंदीये प्रणासी रखी होगी, लेकिन वो मेरे विरोधी बल्कि पिता तुल्य है, जैसे एक बालक अपने पिता के कंधों पर खड़ा होकर अपनी दृष्ट्री को उनसे अधिक व्यापक कर लेता है वैसे ही हम भी कर सकते है, नुतन विचार और पुरातर सोच का संगम । वैसे भी संविधान निर्माताओं से तो आरक्षण की सीमा 10 वर्ष और 10 सालों में ही हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की सोची थी, पर होना सका यानी सोच तभी सार्थक है जब परिवर्तित हो रहें ।

 
अब ऐसा भी नहीं है की यह केवल विचार भर है, इस विचार के पीछे कुछ पूर्व मंत्रियों की सहमति है जो 10जनपथ और 12तुगलक लेन के बेहदकरीबी मानें जाते है और आधार भी है की अगर मोदी के मन में यह बात तो अगला चुनाव में देश की जनता प्रधानमंत्री के नाम पर नहीं ब्लकि राष्ट्रपति के लिए वोट डाल सकती है, आखिर देश बड़ा है, अनेकता से भरपूर भी जिसे एकता के सूत्र में बांधने के लिए ताकवर ऐसा केंद्र चाहिए जो पाक जैसे मुल्कों को ना सिर्फ कड़ी ज़बान में जवाब दे ब्लकि राष्ट्रहित में उसे चीरने की ताकत भी रहे । इसपर जनमत बनाने की जरुरत है क्योकि जब भारत मां की जय पर राजनीति होनें लगे तो भारत को एक करने वाली प्रणाली की जरुरत पर जोड़ देना लाज़मी है । 

सोमवार, दिसंबर 22

दहक रहे है युवा

दहक रहे है युवा


वो दौर बीत गया जब हमारा सपना था अधेड़ उम्र की दहलीज पर अपनी कार की सवारी और रिटायरमैंट के पैसे से अपने घर खरीदना, आज युवाओं में पैशेंस नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। अजस्ट करते-करते हम 125 करोड़ के पार पहुंच गए, अब मेट्रो से बस की सीट के लिए एजस्ट ही तो कर रहे है । अब सहना मान है और साहस जरुरी । हमारी सौच में वर्क-हार्ड और पार्टी-हार्डर का कॉसेप्ट रहता है, हमें क्रेडिट कार्ड पर खुशियां खरीदें की आदत है। हम 18 घंटे काम को तैयार है बशर्ते महीनें के अंत में सैलरी 6 अंको में मिले । हम जितनी मेहनत खुद करते है उतनी ही सरकार से भी चाहते है, तभी 12 घंटे काम करने वाला सीएम चाहिए और 15 घंटे काम करने वाला पीएम । दहकते है चैंज से लिए, पुरानी पीढ़ी से हमें आजादी विरासत में मिली लेकिन आजादी की उड़ान हमे विकास से भरनी है। अब अमेरिका नहीं जा सकते है पर अपने देश को को वेस्ट से बेस्ट बना सकते है । यह बात हमारी सोच में नज़र आती और सपनों में भी...


ऐसा भी नहीं है कि, हम पुरानी पीढ़ी से सरोकार नहीं रखते, बस शर्त केवल इतनी है कि, उन बुजुर्गों की सोच में भी युवा जोश होना चाहिए , जब अन्ना ने कहा वो नेता नौकर है नौकर और हम जनता मालिक हैहम युवा देहके और फेसबुक की वर्चुअल दुनियां छोड़ रामलीला मैदान से भ्रष्टाचार के खिलाफ महाभारत का ऐलान कर दिया । ऐसा भी नहीं की हमारे जोश को किसी नेता की हर दम जरुरत हो, 16 दिसम्बर को दामिनी की अस्मत पर हमला हुआ और हम अपनी उस बहन के वीरा (भाई) बन विजय-चौक पर पहुंच गए, सत्ता के ठेकेदारों को अपने जूते की ठोकर की धमक दिखाई, इंडियां गेट पर लाठी खाई लेकिन ख़ाख़ी और ख़ादी को इसकदर मजबूर कर दिया कि उन्हे संसद की चौपाल से नारी के सम्मान का बिल पास करना पड़ा ।


हमें अब नेताओ के वादे नहीं इरादें चाहिए , पांच साल तक इंतजार करना हमारी फितरत में शुमार नहीं । जब-जिस पल लगा की सरकार खुद को खुदा समझ रही है, जनपथ पर उतरकर राजपथ जाम कर देगें..। हमारी आवाज़ चैनलों और अख़बारों की मौहताज़ भी नहीं, फेसबुक-टयूटर-यू-टियूब से ही अब रक्तहीन क्रांति का आगाज़ करने की ताकत रखते है। 377 को नहीं मानते, लिव-इन के लिए शादी की शर्त भी मंजूर नहीं, हमने बाबरी पर बावरा होना छोड़ दिया है, हमें मंदिर नहीं मेहनत पर भरोसा है, विकास की भूख है और हमे इंतज़ार का अचार पंसद तक नहीं ।

हमारी दहती सोच के निशाने पर सरकार और सियासत ही नहीं पुरातन समाज और सस्कांर भी है जो स्कूली बच्चियों को सर्कट पेहनें से रोकते है और हमे लगता है 10 बरस की बच्ची की सर्कट से छोटी उनकी सोच है जो उस कन्या में भी वासना का वास देख लेते है। संसद और विधानसभाओं में तो नेता सिर्फ जाति-धर्म की ज़ज़ीर तोड़ने का भाषण देते है पर हम तो लव-मैरिज़ से वर्ग औऱ वर्ण के बंधन तोड़कर जीनें का मंत्र जानते हैं । वो लोग तो आज भी खाने में नोर्थ और साउथ इंडियन की सोच रखते है पर हमे को कॉटीनेंटल पंसद है, ग्लोबल हमारी समझ है और बटावा हमें भाता नहीं ।


जड़ो से प्यार हमें भी है, लेकिन जड़ो में जकड़े जाना मुनासिब नहीं लगता, 15 अगस्त पर अग्रेज़ों के अत्याचार की कहानी बार-बार सुनना हमे बोरिगं लगता है, करेप्शन की कांट लाल-किले के प्राचीर से बताओं तो जानें...। हाथ जोड़ना हमारे संस्कार में है पर हमेशा जुड़े रहे यह जरूरी नहीं , हमे सपनों का भारत नहीं बल्कि सचाई का भारत चाहिए । आरटीआई, आरटीई, फूड-सिक्रोरिटी उनकी भीख नहीं हमारी भूख की वजह से मिला वरना जिन नौकरशाहों को एक सरकारी फाइल पर साइन करने में परेशानी होती है वो सिटीजन-चार्टर के तहत अपनी मर्जी से काम करने लगे यह तो संता-बंता से बड़ा जोक होगा । कुछ लोग कहते है कि युवा जोश हमेऱशा ठोकर का शिकार होता है लेकिन गिरता वहीं है जो दौड़ता है और हमें खड़े-खड़े पाषाण बन जाते है ठोकर खाती नदीं बनता बेहतर लगता है । हमने पड़ोसी पाकिस्तान औऱ श्रीलंका से तुलना करना छोड़ दिया है हमे  चीनी ड्रेगन सी रफ्तार चाहिए और अमेरिकी अंकल सेम सी अरीमी भी ..और हम इसे सिर्फ कहकर नहीं छीनकर लेगें...।
                                            


मंगलवार, नवंबर 8

“तीसरा आयाम - 3D”

रामलीला मैदान के गांधी को देखने भारत जुटा और F1 की आंधी देखने इंडिया..दोनो धुर विरोधी हैं पर दोनों दोस्त भी हैं। F1 की रेस के रेले में शुमार कई सितारे अन्ना के आन्दोलन की भी चमक थे, दोनों तरफ तिंरगें थे एक ओर गांधी टोपी और दूसरी तरफ लेडी गागा के गाने..। लेकिन इस दोनों मलासा ख़बरों के अलग भी एक तीसरा आयाम है। वो आयाम जो दिल्ली के दुरुस्त और मुंबई की माया से जुदा मणिपुर है। जहां आज 101 दिनों से आर्थिक नाकेबंदी हो रही है। जहां LPG Gas 2000Rs/किलो और पेट्रोल 200 रुपए लीटर बिक रहा है। जिसकी आवाज़ सुनने को कोई तैयार नहीं क्योंकि वहां ट्रकों के चलने से दिल्ली की रिंग रोड़ पर जाम नहीं लगता, ख़बरिया भेड़ियों के TRP नहीं मिलती और संसद के चौपाल पर जूं नहीं रेंगती। ठीक उसी तरह जैसे कांग्रेस के युवराज का कलावती के घर जाना नेशनल टीवी पर आता, उसका नाम संसद में सुनाया जाता है पर राहुल के जाते ही बस समाप्त...मौत की खामोशी में कलावती सो जाती है, किसानी के कर्ज में उसकी बेटी मर जाती है पर ख़बर नहीं बनती।

हम ग्लोबल गांव में जीने वाले हैं इसलिए दिल्ली हो या दुबई, न्यूयार्क हो या नागपुर कहीं कोई अंतर नहीं है। दुनियां या यू कहें की पूंजीवाद के ठेकेदार अमेरिका में भी अपने हिन्दुस्तान के दो देश बसते है। एक आवाम की आवाज़ है जो कहती हैं वॉलस्ट्रीट पर कब्ज़ा करो, 99 फीसदी की रोटी काट-काट कर 1% पेट भरना सरकार का पेशा नहीं है। वो मुहिम है कि मंदी का मार Tax के रुप में अमीर अमेरिकियों पर पड़े, सरकारी सेवा कम करके जनता पर नहीं, वहीं अमीर पूंजीवादी बेल-आउट पैकेज के नाम पर अपने लिए वक्त चुरा रहे हैं। बीमारी का इलाज नहीं होता..महज महंगाई पर मरहम लगाने से...। उस अमेरिका के पास भी भारत के मणिपुर की तरह एक तीसरा आयाम है वेनेज़ुला वो छोटा सा पड़ोसी देश अपने गन्ने और तेल के दम पर पूंजीवाद के खिलाफ दंबग बनकर भी अपनी जनता के पेट भरना जानता है।

आपके मन में सवाल उठता होगा की यह तीसरा आयाम आखिर है क्या और आयाम से आवाम का भला क्यों होगा?  इसे समझने के दो रास्ते हैं, पहला अरस्तु और प्लेटों के सिद्धांत का चक्र कि वक्त खुद हो दोहराता है, और वाद ISM अमित नहीं होते। 1917 के रुसी क्रांति के 100 साल होने में महज पांच वर्ष बाकी है, USSR का किला ढल गया और पूंजीवाद के दुर्ग भी ढहने की कगार पर है। समझने के लिए दूसरा रास्ते ठेठ देसी है, कि जैसे आपका TV Black&White से रंगीन हो गया वैसे ही बाहरी दुनिया को देखने की सोच का चश्मा भी काला या सफेद नहीं रंगीन ही रखिए। जैसे जिस मुल्क में हम रहते हैं वह इंडिया और भारत का बेटा ज़रुर नज़र आता है पर अलग नहीं है। ठीक हिन्दी और उर्दू के बीच की हिन्दुस्तानी की तर्ज पर...।

मैं आरक्षण के खिलाफ हूं, सब्सिडी के भी..। हमें बैसाखी नहीं चाहिए पर Rock-Star मूवी की ज़ुबान में “साडा हक ऐथे रख” ज़रुर चाहिए..। हक़ पढ़ने का ताकी आरक्षण की नीति के साथ-साथ Cast Vote Bank की राजनीति के भी अंत हो जाए। हक़ सेहत का ताकी हर साल महंगे इलाज के चलते एक करोड़ लोग गरीबी रेखा (BPL) से नीचे नहीं आए...। हक़ समानता का ताकी मुंबई के शेयर बाज़ार के हाल और दिल्ली के जाम के बीच मणिपुर का मर्म छिप ना जाए। हक़ ज़मीन का ताकी खेती और प्लेट के बीच का मुनाफ़ा चंद बिल्डरों का बैंक ना उठा ले..। हक़ अभिव्यक्ति की आज़ादी का ताकी अन्ना के चंद दिनों के अनशन के साथ-साथ उत्तर-पूर्व की उस महिला (इरोम शार्मिला) का नाम भी सबको याद हो जो बीते 12 सालों से अनशन पर बैठी है।

हक़ तीसरे आयाम का जो गूगल के गलियारे, अँग्रेजी के अल्फाज़ो और मीडिया के ख़बरों से दूर बसता है मंदी और महंगाई का इलाज़ है जिसे संजीवनी हो हम AIMS की चका-चौंध में खोजना नहीं चाहते और देखकर भी अंधे बन जाते हैं। आयाम जो दिखाना है कि ज़जमानी प्रथा (अन्न के बदले सामान), इस्लामिक बैंकिंग (बिन ब्याज़ के कर्ज) और गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत (मालिक भी एक कामगार है और कम्पनी एक परिवार) से आज भी बदलाव मुमकिन है बशर्ते हम तीसरे आयाम को देखना चाहते। लेकिन इस हक़ के लिए कीमत भी चुकानी पड़ेगी क्योंकि कर्तव्यों के बाद भी अधिकार संभव है। इसलिए आपको तीसरे आयाम की सोच और एक सवाल के साथ छोड़ जाता हूं...सवाल मेरी पत्नी के शब्दों में “सरकारी स्कूलो में पढ़ना हमे मंज़ूर नहीं, सरकारी अस्पताल में इलाज़ हमें गवारा नहीं, सरकारी सड़कों को दोष देते हैं और सरकार को गाली पर सरकारी नौकरी सबको चाहिए आखिर क्यों….?”